बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४ 
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[विपर्यय = विपरीत(उलटा) । जो शब्द वाक्य(साषी एवं पद) लोकव्यवहार में सुनने में असंगत, असम्भव या बेढ़ंगा(अटपटा) प्रतीत हो; परन्तु अध्यात्म विचार से चिन्ता करने पर जिसका अर्थ उचित, यथार्थ एवं चमत्कारयुक्त लगे - ऐसे शब्द या वाक्य सन्तों की भाषा में विपर्यय कहलाते हैं । इनको ही वे उलटबाँसी भी कहते हैं । ऐसी उलटवाँसियाँ लिखने में कबीर, सन्त श्रीदादूदयाल, रज्जब जी, श्रीसुन्दरदासजी आदि सन्त सिद्धहस्त माने गये हैं ।
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श्रीसुन्दरदासजी को इस विपर्ययपद्धति से लिखना अतिशय मनोनुकूल था, अतः एव इन ने अपने सवैया ग्रन्थ में विपर्यय को अङ्ग नाम से एक दीर्घकाय प्रकरण लिखा है । उसी प्रकरण को उसी नाम से यहाँ क्रमशः पुनः संक्षिप्त(साषी) सूत्र रूप से लिख रहे हैं । अतः हम इन सभी साषियों का वाच्यार्थ स्पष्ट करते हुए अन्त में समानार्थक सवैया का संख्याबोधक अङ्ग भी दे रहे हैं । जिससे जिज्ञासु वहाँ इसका विस्तार देख सकें ।]
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सुन्दर कहत बिचारि करि, उलटी बात सुनाइ । 
नीचे कौ मूंडी करै, तब ऊंचे कौ पाइ ॥१॥
(श्रीसुन्दरदासजी इस अंग में विपरीत शब्दों के माध्यम से जिज्ञासु को हितोपदेश कर रहे हैं, जिन को जिज्ञासु विवेकपूर्वक यथार्थ में जान कर अपना हित सम्पादन कर सकेंगे । उन में प्रथम उपदेश है -)
कोई भी साधक, व्यवहार एवं साधक में नीचा शिर(नम्र हो) कर के ही उच्च(परम निर्वाण) पद प्राप्त कर पाता है ।
साषी में प्रयुक्त नीची मुंडी शब्द का यदि शीर्षासन अर्थ किया जाय तो जिज्ञासु के लिये योगशास्त्र का अभ्यास भी आवश्यक है । तभी उसे परम पद की प्राप्ति सुगम हो पायगी ॥१॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० १ तथा परिशिष्ट में इसी छन्द की टीका ।)
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अन्धा तीनौं लोक कौं, सुंदर देखै नैंन । 
बहिरा अनहद नाद सुनि, अति गति पावै चैंन ॥२॥ 
जब कोई साधक साधना द्वारा अपनी बाह्य(लौकिक) दृष्टि(चक्षुरिन्द्रिय) पर नियन्त्रण कर लेता है तब उसकी अन्तर्दृष्टि(अध्यात्मदृष्टि) खुल जाती है । तभी वह साधक समस्त संसार(तीनों लोकों को) दिव्य(यथार्थ) दृष्टि से देख पाता है ।
इसी प्रकार, साधना करते हुए जब कोई साधक अपनी श्रवणेन्द्रिय से बाहर के सांसारिक प्रलाप सुनना रोक देता है, तब उस को ऐसा दिव्य अन्तर्नाद(अनहद नाद) सुनायी देने लगता है कि वह उसके प्रभाव से ब्रह्मानन्द सुख का अनुभव करने लगता है ॥२॥ (द्र० – सवैया : २२/छन्द सं० २)
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नकटा लेत सुगन्ध कौं, यह तौ उलटी रीति । 
सुन्दर नाचै पंगुला, गूंगा गावै गीति ॥३॥
कोई भी साधक साधना करते हुए लोक लाज का बन्धन तोड़कर(नकटा होकर) जब साधना की उच्च भूमिका में पहुँच जाता है तब वह ब्रह्मानन्द रूप कमल के पराग की सुगन्ध का अनुभव करने लगता है । (यद्यपि लौकिक दृष्टि से यह बात अयथार्थ लगती है कि कोई नासिकाविहीन पुरुष कमल की गन्ध ले सके ।)
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपने मन को पंगुल(चञ्चलता रहित) बना दे तो वह इस स्थिति में पहुँच कर भगवद्भक्ति में उन्मत्त होकर अपने प्रभु के सम्मुख आत्मानन्द का अनुभव करता हुआ नृत्य करने लगता है ।
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपनी वैखरी वाणी पर निग्रह कर(लौकिक दृष्टि से गूंगा होकर), परा पश्यन्ती वाणी के द्वारा ब्रह्मविचारमय सङ्गीत गाने लगता है, भगवद्भजन गाने लगता है ॥३॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २) ॥३॥
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कीडी कूंजर कौं गिलै, स्याल सिंह कौं खाइ । 
सुन्दर जल तैं माछली, दौरि अग्नि मैं जाइ ॥४॥
साधक के अध्यात्मविद्या में मग्न होने पर उसकी अतिसूक्ष्म चिन्तक शुद्ध ब्रह्मानन्दमय बुद्धि(कीरी = चींटी) उसके काम क्रोध आदि उन्मत्त विकारों(हाथियों) को निगल गयी । (अर्थात् साधक ने अपने अध्यात्म ज्ञान के बल से इन विकारों को नष्ट कर दिया ।)
आत्मस्वरूप को भूलकर सुप्त साधक(श्रुगाल = गीदड़) ने गुरुपदेश से प्राप्त साधनोपदेश के बल पर अपनी स्मृति को जाग्रत् कर संशय-विपर्यय रूप अध्यास(सिंह) को खा डाला । (नष्ट कर दिया) । (आत्मानुभव द्वारा उसको जगन्मिथ्यात्व स्पष्ट हो गया ।)
इसी प्रकार, पहले जीवरूपी मछली अज्ञानवश इस काया रूप जल में प्रसन्न थीं; परन्तु ब्रह्मज्ञान के उत्पन्न होते ही वह ज्ञानाग्नि में जा गिरी तब उसे यथार्थ सुख मिला । अर्थात् सत्यज्ञान के उदित होने के साथ ही अधोगतिमय संसार से मुक्त होकर उसे ऊर्ध्व गति(ब्रह्मानन्द) की प्राप्ति हो गयी ॥४॥ (द्र०- सवैया : २२/छ० ३)
(क्रमशः) 

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