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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ ।*
*राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्वै जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ४~वराहनगर मठ*
*(१)रवीन्द्र का पूर्वजीवन*
आज सोमवार है, ९ मई, १८८७, जेष्ठ कृष्ण की द्वितीया । नरेन्द्र आदि भक्तगण मठ में हैं । शरद, बाबूराम और काली पुरी गये हुए हैं और निरंजन माता को देखने के लिए । मास्टर आये हैं । भोजन आदि के पश्चात् मठ के भाई जरा देर विश्राम कर रहे हैं । गोपाल(बूढ़े गोपाल) गाने की कापी में गाना उतार रहे हैं ।
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दिन ढल रहा है । रवीन्द्र पागल की तरह आकर उपस्थित हुए । नंगे पैर, काली धारी की सिर्फ आधी धोती पहने हुए हैं, पागल की तरह आँखों की पुतलियाँ घूम रही हैं । लोगों ने पूछा, 'क्या हुआ ?' रवीन्द्र ने कहा, 'जरा देर बाद बतलाता हूँ, मैं अब और घर न लौटूँगा, यहीं आप लोगों के साथ रहूँगा । उसने विश्वासघात किया, जरा देखिये तो साहब, पूरे पाँच साल की आदत, - सो शराब पीना तक मैंने उसके लिए छोड़ दिया - आज आठ महीने हुए मुझे शराब छोड़े, इसका फल यह कि वह पूरी धोखेबाज निकली ।' मठ के भाइयों ने कहा- 'तुम जरा ठण्डे हो लो, तुम आये किस सवारी से ?'
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रवीन्द्र - मैं कलकत्ते से बराबर नंगे पैर पैदल चला आ रहा हूँ ।
भक्तों ने पूछा, 'तुम्हारी आधी धोती क्या हो गयी ?' रवीन्द्र ने कहा, 'आते समय उसने धर-पकड़ की, इसी में आधी धोती फट गयी ।' भक्तों ने कहा, 'तुम गंगा-स्नान करके आओ, आकर ठण्डे होओ, फिर बातचीत होगी ।'
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रवीन्द्र का जन्म कलकत्ते के एक बहुत ही प्रतिष्ठित कायस्थ वंश में हुआ है । उम्र २०-२२ साल की होगी । श्रीरामकृष्ण को उन्होंने दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में देखा था और उनकी कृपा प्राप्त की थी । एक बार तीन रात लगातार वहाँ रह भी चुके थे । स्वभाव के बड़े मधुर और कोमल हैं । श्रीरामकृष्ण इन पर बड़ा स्नेह करते थे । परन्तु उन्होंने कहा था, "तेरे लिए अभी देर है अभी तेरे लिए कुछ भोग बाकी हैं । अभी कुछ न होगा ।
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जब डाकू छापा मारते हैं, तब ठीक उसी समय पुलिस कुछ कर नहीं सकती । जब हलचल कुछ शान्त हो जाती है तब पुलिस आकर गिरफ्तार करती है ।" आज रवीन्द्र वारांगना के जाल में पड़ गये हैं, परन्तु और सब गुण उनमें हैं । गरीबों के प्रति दया, ईश्वर-चिन्तन, यह सब उनमें है । वेश्या को विश्वासघातक जानकर आधी धोती पहने हुए मठ में आये हैं । संसार में अब नहीं लौटेंगे, इसका उन्होंने दृढ़ संकल्प कर लिया है ।
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रवीन्द्र गंगा-स्नान के लिए जा रहे हैं । परामाणिक घाट पर जायेंगे । एक भक्त भी साथ जा रहे हैं ।
उनकी हार्दिक इच्छा है कि साधुओं के साथ इस युवक में चेतना का संचार हो । गंगा-स्नान के पश्चात् रवीन्द्र को वे घाट ही के पासवाले एक श्मशान में ले गये । वहाँ उसे लाशें दिखलाने लगे । कहा - "यहाँ कभी कभी रात को मठ के भाई आकर ध्यान करते हैं । यहाँ हम लोगों के लिए ध्यान करना अच्छा है । संसार की अनित्यता खूब समझ में आती है ।" उनकी यह बात सुनकर रवीन्द्र ध्यान करने के लिए बैठे, परन्तु ज्यादा देर तक ध्यान नहीं कर सके । मन चंचल हो रहा था ।
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दोनों मठ लौटे । पूजा-घर में आकर दोनों ने श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम किया । भक्त ने कहा, मठ के भाई इसी कमरे में ध्यान करते हैं । रवीन्द्र जरा देर के लिए ध्यान करने बैठे । परन्तु ध्यान अधिक देर तक न हो सका ।
मास्टर - क्या मन बहुत चंचल हो रहा है ? शायद इसलिए तुम इतनी जल्दी उठ पड़े ? शायद ध्यान अच्छी तरह जमा नहीं ?
रवीन्द्र - यह निश्चय है कि अब घर न लौटूँगा, परन्तु मन चंचल जरूर है ।
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मास्टर और रवीन्द्र मठ में एकान्त स्थान पर खड़े हैं । मास्टर बुद्ध की बातें कर रहे हैं । देवकन्याओं का एक गाना सुनकर बुद्ध को पहले-पहल चैतन्य हुआ था । आजकल मठ में बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र की चर्चा प्रायः हुआ करती है । मास्टर वहीं गाना गा रहे हैं ।
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रात को नरेन्द्र, तारक और हरीश कलकत्ते से लौटे । आते ही उन्होंने कहा - 'ओह, खूब खाया !' कलकत्ते में किसी भक्त के यहाँ उनकी दावत थी ।
नरेन्द्र और मठ के दूसरे भाई, मास्टर तथा रवीन्द्र आदि भी, 'दानवों के कमरे' में बैठे हुए हैं । मठ में नरेन्द्र को रवीन्द्र का सब हाल मिल चुका है ।
(क्रमशः)

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