मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

*१८. सूरातन कौ अंग २३/२५*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग २३/२५*
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सुन्दर निस दिन साधु कै, मन मारन की मूठि । 
मनकै आगै भागि करि, कबहुं न फेरै पूठि ॥२३॥
इस प्रकार, साधक को अपने मन पर निग्रह करने हेतु, गुरूपदिष्ट ज्ञान रूप खड्‌ग हाथ में ले कर, सर्वदा सन्नद्ध रहना चाहिये । ऐसा न हो कि वह साधक इस युद्ध में हताश होकर मन को पीठ दिखाता हुआ पीछे हट जाय; क्योंकि पीछे हट कर भागना तो उस की कायरता ही कहलायगी ॥२३॥
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मारै सब संग्राम करि, पिसुनहु ते घट मांहिं । 
सुन्दर कोऊ सूरमा, साधु बराबरि नांहिं ॥२४॥
साधक को अपने अन्य काम क्रोध, राग द्वेष, लोभ मोह आदि आन्तरिक शत्रुओं को भी इसी(उपर्युक्त) पद्धति से युद्ध करते हुए नष्ट कर देना चाहिये; क्योंकि साधु से बढकर अन्य कोई वीर इस संसार में श्रीसुन्दरदासजी को नहीं दिखायी देता ॥२४॥
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साधु सुभट अरु सूरमा, सुन्दर कहै बखांनि । 
कहन सुनन कौं और सब, यह निश्चय करि जांनि ॥२५॥
इति सूरातन कौ अङ्ग ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - इस प्रकार उपर्युक्त २४ दोहा छन्दों के माध्यम से साधु, योद्धा(सैनिक) एवं वीर के लक्षण बता दिये । इन लक्षणों से विहीन कोई पुरुष यदि स्वयं को 'वीर' कहता है तो यह उस का कथनमात्र ही है; इसमें वास्तविकता नहीं है ॥२५॥
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इति सूरातन कौ अङ्ग सम्पन्न ॥१८॥
(क्रमशः)

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