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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३३/१३६*
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*शब्द सुरति परसे नहिं, तब लग बाँझी जोय१ ।*
*रज्जब परसी जानिये, जब बालक विरहा होय ॥१३३॥*
१३३ - १३८ में शब्द और सुरति के मिलन की पहचान बता रहे हैं - जैसे नारी१ पुरुष से नहीं मिलती तब तक बंध्या ही है और जब उसके बालक हो जाय तब जानो कि - वह पुरुष से मिली है । वैसे ही जब तक वृत्ति सद्गुरु से नहीं मिलती तब तक बंध्या ही है । जब वृत्ति भगवद् विरह उत्पन्न होता है तब ही निश्चय होता है कि - यह सद्गुरु शब्द से मिली है ।
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*घन बादल वर्षा भई, सींप हिं श्रध्दा नाँहिं ।*
*रज्जब उपज्यों ऊपजे, स्वाति बूंद पड़ माँहिं ॥१३४॥*
बादलों के समूह से स्वाति नक्षत्र में वर्षा हुई किन्तु शुक्ति में उसे लेने की इच्छा नहीं हुई तो मोती कैसे होगा ? वह तो सींप में स्वाति बिन्दु लेने की श्रध्दा होने पर ही स्वाति बिन्दु उसमें पड़कर उत्पन्न होगा । वैसे ही वृत्ति में सद्गुरु-शब्द ग्रहण की श्रध्दा न होगी तो ज्ञान उत्पन्न न होगा । श्रध्दा होने पर ही वृत्ति में शब्द स्थिर होकर ज्ञान होगा ।
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*घटा सुगुरु आशोज की, स्वाति बूंद सत बैन ।*
*सीप सुरति श्रध्दा सहित, तहँ मुक्ता मन ऐन१ ॥१३५॥*
आश्विन मास घन-घटा से वर्षने वाली स्वाति बिन्दु को शुक्ति ठीक१ ढंग से लेती है, तब ही उसमें मोती बनता है । वैसे श्रेष्ठ गुरु के सत्य वचन शिष्य की वृत्ति श्रध्दा सहित ग्रहण करती है तब मन साँसारिक भावनाओं से भली प्रकार मुक्त हो जाता है ।
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*आतम आरतिवंत है, सद्गुरु शब्द समाय ।*
*रज्जब रुचि के राचणे, फल मांही रह जाय ॥१३६॥*
जीवात्मा विरह दु:ख से युक्त होता है, तब उसकी वृत्ति सद्गुरु-शब्दों में ही लीन होती है, फिर अपनी रुचि के अनुसार प्रभु-प्रेम में निमग्न होती है उक्त साधना का फल यही होता है कि वृत्ति संसार में जाने से रुक कर प्रभु में स्थिर हो जाती है ।
(क्रमशः)

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