रविवार, 8 फ़रवरी 2026

*१९. साधु कौ अंग १७/२०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर आये संतजन, मुक्त करन कौं जीव । 
सब अज्ञान मिटाइ करि, करत जीव तें सीव ॥१७॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - भगवान् ने इन सभी सन्तों को इस संसार में जीवों को भवबन्धन से मुक्त कराने के लिये ही भेजा है । ये इन पामर प्राणियों का समस्त अविद्यान्धकार मिटाकर साधारण जीव से शिव(परमात्मा) के रूप में परिवर्तित कर आनन्दमय जीवन बिताने योग्य बना देते हैं ॥१७॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै सब कौ भेद । 
वचन अनेक प्रकार के, प्रगट कहे जे बेद ॥१८॥
जब सत्सङ्ग करता हुआ वह जिज्ञासु गुरुमुख से श्रुत ज्ञानोपदेश द्वारा सब भेद(द्वैत) को छिन्न भिन्न कर अद्वैतावस्था में पहुँच जाता है तब वह भी वेद के समान यथार्थ वचन बोलने का अधिकारी बन जाता है । (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) ॥१८॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्गुन भक्ति । 
प्रीति लगै परब्रह्म सौं, सब तें होइ बिरक्ति ॥१९॥
जब साधक(भक्त जन) के हृदय में उस सत्सङ्ग के प्रभाव से निर्गुण(निरञ्जन निराकार) की भक्ति का उदय हो जाता है तो उसका शनैः शनैः निरञ्जन निराकार प्रभु में अनन्य प्रेम हो जाता है । तथा इसके फलस्वरूप, इस को संसार से परम वैराग्य हो जाता है ॥१९॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्मल बुद्धि । 
जांनै सकल बिबेक करि, जीव ब्रह्म की सुद्धि ॥२०॥
अब सत्सङ्ग के प्रभाव से इस साधक(भक्त) की निर्मल(स्वच्छ) बुद्धि में विवेक ज्ञान उद्भूत हो जाता है तो वह उस के माध्यम से जीव ब्रह्म का अभेद ज्ञान प्राप्त कर अद्वैत भाव की ओर बढ़ जाता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

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