रविवार, 8 फ़रवरी 2026

समाधिमग्न

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ ।*
*पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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घण्टे-डेढ़-घण्टे बाद कीर्तन शुरू हुआ । उस समय मैंने जो कुछ देखा, वह शायद जन्म-जन्मान्तर में भी न भूलूँगा । सब के सब नाचने लगे । केशव को भी मैंने नाचते हुए देखा, बीच में थे श्रीरामकृष्ण, और बाकी सब लोग उन्हें घेरकर नाच रहे थे । नाचते ही नाचते बिलकुल स्थिर हो गये – समाधिमग्न । बड़ी देर तक उनकी यह अवस्था रही ।
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इस तरह देखते और सुनते हुए मैं समझा, ये यथार्थ ही परमहंस हैं । एक दिन और, शायद १८८३ ई. में, श्रीरामपुर के कुछ युवकों को मैं साथ लेकर गया था । उस दिन उन युवकों को देखकर परमहंसदेव ने कहा था, 'ये लोग क्यों आये हैं ?'
मैंने कहा, - 'आपको देखने के लिए ।'
श्रीरामकृष्ण - मुझे ये क्या देखेंगे ? ये सब लोग बिल्डिंग(इमारत) क्यों नहीं देखते जाकर ?
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मैं - ये लोग यह सब देखने नहीं आये । ये आपको देखने के लिए आये हैं ।
श्रीरामकृष्ण - तो शायद ये चकमक पत्थर हैं । आग भीतर है । हजार साल तक चाहे उसे पानी में डाल रखो, परन्तु घिसने के साथ ही उससे आग निकलेगी । ये लोग शायद उसी जाति के कोई जीव हैं ? हम लोगों को घिसने पर आग कहाँ निकलती है ?
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यह अन्त की बात सुनकर हम लोग हँसे । उसके बाद और भी कौन-कौनसी बातें हुई, मुझे याद नहीं । परन्तु जहाँ तक स्मरण है, शायद 'कामिनीकांचन-त्याग' और 'मैं की बू नहीं जाती' इन पर भी बातचीत हुई थी ।
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मैं एक दिन और गया, प्रणाम करके बैठा कि उन्होंने कहा - "वही जिसकी डाट खोलने पर जोर से 'फस्-फस्' करने लगता है, कुछ खट्टा कुछ मीठा होता है - एक वही ले आओगे?" मैंने पूछा – 'लेमोनेड ?' श्रीरामकृष्ण ने कहा- "ले आओ न ।" जहाँ तक मुझे याद है शायद मैं एक लेमोनेड ले आया । इस दिन शायद और कोई न था ।
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मैंने कई प्रश्न किये थे - "आपमें क्या जाति-भेद है ?"
श्रीरामकृष्ण - कहाँ है अब ? केशव सेन के यहाँ की तरकारी खायी । अच्छा, एक दिन की बात कहता हूँ । एक आदमी बर्फ ले आया, उसकी दाढ़ी खूब लम्बी थी, पहले तो खाने की इच्छा न जाने क्यों नहीं हुई, फिर कुछ देर बाद एक दूसरा आदमी उसी के पास से बर्फ ले आया तो मैं दाँतो से चबाकर सब बर्फ खा गया । यह समझो कि जाति-भेद आप ही छूट जाता है ।
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जैसे, नारियल और ताड़ के पेड़ जब बड़े होते हैं तब उनके बड़े बड़े डण्ठलदार पत्ते पेड़ से आप ही टूटकर गिर जाते हैं । इसी तरह जाति-भेद आप ही छूट जाता है । झटका मारकर न छुड़ाना, उन सालों की तरह !
मैंने पूछा - केशवबाबू कैसे आदमी हैं ?
श्रीरामकृष्ण - अजी, वह दैवी आदमी है ।
मैं - और त्रैलोक्यबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - अच्छा आदमी है, बहुत सुन्दर गाता है ।
मैं - और शिवनाथबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - आदमी अच्छा है, परन्तु तर्क जो करता है - ?
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मैं – हिन्दू और ब्राह्म में अन्तर क्या है ?
श्रीरामकृष्ण - अन्तर और क्या है ? यहाँ शहनाई बजती है । एक आदमी स्वर साधे रहता है, और दूसरा तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाता है । ब्राह्मसमाजवाले ब्रह्म का स्वर साधे हुए हैं और हिन्दू उसी स्वर के अन्दर तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाते हैं ।
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"पानी और बर्फ । निराकार और साकार । जो चीज पानी है, वही जमकर बर्फ बनती है । भक्ति की शीतलता से पानी बर्फ बन जाता है !
"वस्तु एक ही है, अनेक मनुष्य उसे अनेक नाम देते हैं । जैसे तालाब के चारों ओर चार घाट हो । इस घाट में जो लोग पानी भर रहे हैं, उनसे पूछो तो कहेंगे, जल है । उधर के घाट में जो लोग हैं वे पानी कहेंगे । तीसरे घाटवाले कहेंगे, वाटर और चौथे घाट के लोग कहेंगे, एकुआ । परन्तु पानी एक ही है ।"
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मेरे यह कहने पर कि बरीशाल में अचलानन्द अवधूत के साथ मेरी मुलाकात हुई थी, उन्होंने कहा - "वही कोतरंग का रामकुमार न ?" मैंने कहा, 'जी हाँ ।'
श्रीरामकृष्ण - उसे तुम क्या समझे ?
मैं - जी, वे बहुत अच्छे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, वह अच्छा है या मैं ?
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मैं - आपकी तुलना उनके साथ ? वे पण्डित हैं, विद्वान् हैं, आप पण्डित और ज्ञानी थोड़े ही हैं ?
उत्तर सुनकर कुछ आश्चर्य में आकर वे चुप हो गये । एक मिनट बाद मैंने कहा, "हाँ, वे पण्डित हो सकते हैं, परन्तु आप बड़े मजेदार आदमी हैं । आपके पास मौज खूब है ।"
अब हँसकर उन्होंने कहा - "खूब कहा, अच्छा कहा ।"
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मुझसे उन्होंने पूछा - "क्या मेरी पंचवटी तुमने देखी है ?"
मैंने कहा, "जी हाँ ।" वहाँ वे क्या करते थे, यह भी कहा - अनेक तरह की साधनाओं की बातें । मैंने पूछा - "उन्हें किस तरह हम पायें ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, चुम्बक जिस तरह लोहे को खींचता है, उसी तरह वे हम लोगों को खींच ही रहे हैं । लोहे में कीच लगा रहने से चुम्बक से वह चिपक नहीं सकता । रोते रोते जब कीच धुल जाता है, तब लोहा आप ही चुम्बक के साथ जुड़ जाता है ।
(क्रमशः)

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