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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४९ /१५२*
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*कल्प वृक्ष गुरु को कहा, जे कल्पे नहिं दास ।*
*जन रज्जब रुचि प्यास बिन, निश्चय जाय निराश ॥१४९ ॥*
कल्प वृक्ष के नीचे जाकर किसी वस्तु के प्राप्त करने की कल्पना न करे तो प्राणी अपनी अभिलाषा के बिना निराश होकर जाता है । वैसे ही रुचि के बिना गुरु के पास जाकर प्रश्न न करे तो गुरु का क्या दोष है । वह तो निश्चयपूर्वक निराश हो जायेगा ।
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*काम धेनु गुरु क्या करे, शिष निष्कामी होय ।*
*रज्जब मिला रीता रह्या, मंद भाग्य शिष जोय१ ॥१५० ॥*
कामना न करने वाले का कामधेनु क्या भला करेगी ? वह तो कामधेनु से मिलकर भी खाली रहेगा । वैसे ही देख१, गुरु मिलने पर भी शिष्य प्रश्न न करे तो, वह मन्द भाग्य ही है ।
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*रज्जब वर्ण अठारह भार विधि, सद्गुरु चन्दन माँहिं ।*
*शब्द वास भिद सो सबै, अरण्ड बाँस खल नाँहिं ॥१५१॥*
जैसे चन्दन की सुगन्ध से विद्ध होकर अठारह भार वनस्पति चन्दन बन जाती है अर्थात् अपनी गंध को छोड़ कर चन्दन की सुगन्ध से युक्त हो जाती है । किन्तु ऐरण्ड और बाँस नहीं बदलते । वैसे ही सद्गुरु के उपदेशमय शब्दों से चारों ही वर्ण के प्राणियों के हृदय बदल जाते हैं किन्तु दुष्टों के नहीं बदलते ।
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*बिन घटि माल रहट की भरमें, जल आवे कुछ नाँहीं ।*
*त्यूं रज्जब चेतन१ बिन चेला, रीता संगति माँही ॥१५२॥*
जब घटिकाओं के बिना अरहट्ट की माला घूमती है तब किचिंत मात्र भी जल नहीं निकलता । वैसे ही जिस शिष्य में सात्त्विकी बुद्धि१ न हो वह सत्संग में रहकर भी खाली ही रह जाता है ।
(क्रमशः)

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