शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ ।*
*मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(घ) परिच्छेद १, भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण* 
*(एक पत्र), (श्री अश्विनी दत्त द्वारा श्री 'म' को लिखित)*
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प्रिय प्राणों के भाई श्री 'म', तुम्हारा भेजा हुआ श्रीरामकृष्ण वचनामृत, चतुर्थ खण्ड, शरद-पूर्णिमा के दिन मिला । आज द्वितीया को मैंने उसे पढ़कर समाप्त किया । तुम धन्य हो, इतना अमृत तुमने देश भर में सींचा !... खैर, बहुत दिन हुए, तुमने यह जानना चाहा था कि श्रीरामकृष्ण के साथ मेरी क्या बातचीत हुई थी । इसलिए तुम्हें उस सम्बन्ध में कुछ लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ । 
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मुझे कुछ श्री 'म' की तरह भाग्य तो मिला नहीं कि उन श्रीचरणों के दर्शन का दिन, तारीख, मुहूर्त, और उनके श्रीमुख से निकली हुई सब बातें बिलकुल ठीक ठीक लिख रखता; जहाँ तक मुझे याद है, लिख रहा हूँ, सम्भव है एक दिन की बात को दूसरे दिन की कहकर लिख डालूँ । और बहुतसी बातें तो भूल ही गया हूँ ।
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शायद सन् १८८१ की पूजा की छुट्टियों के समय पहले-पहल मुझे उनके दर्शन हुए थे । उस दिन केशवबाबू के आने की बात थी । नाव से दक्षिणेश्वर पहुँच, घाट से चढ़कर मैंने एक आदमी से पूछा - "परमहंस कहाँ हैं ?" उस मनुष्य ने उत्तर की ओर के बरामदे में तकिये के सहारे बैठे हुए एक व्यक्ति की ओर इशारा करके बतलाया - "ये ही परमहंस हैं ।" 
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'परन्तु मैंने देखा, दोनों पैर ऊपर उठाये और उन्हें अपने हाथों से घेरकर बाँधे हुए अध-चित होकर वे तकिये का सहारा लिए बैठे हैं । मेरे मन में आया, इन्हें कभी बाबुओं की तरह तकिये के सहारे बैठने या लेटने की आदत नहीं है; सम्भव है, ये ही परमहंस हों । तकिये के बिलकुल पास ही उनके दाहिनी ओर एक बाबू बैठे थे । मैंने सुना, वे राजेन्द्र मित्र हैं । बंगाल सरकार के सहायक सेक्रेटरी रह चुके हैं । उनके दाहिनी ओर कुछ और सज्जन बैठे हुए थे । 
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परमहंसदेव ने कुछ देर बाद राजेन्द्रबाबू से कहा - 'जरा देखो तो सही, केशव आया है या नहीं ।' एक ने जरा बढ़कर देखा, लौटकर उसने कहा - "नहीं आये ।" थोड़ी देर में कुछ शब्द हुआ तब उन्होंने फिर कहा - 'देखो, जरा फिर तो देखो ।' इस बार भी एक ने देखकर कहा - 'नहीं आये ।' साथ ही परमहंसदेव ने हँसते हुए कहा - "पत्तों के झड़ने का शब्द हो रहा था, राधा सोचती थी - मेरे प्राणनाथ तो नहीं आ रहे हैं ! क्यों जी, क्या केशव की सदा की यही रीति है ? आते ही आते रुक जाता है ।" कुछ देर बाद, सन्ध्या हो ही रही थी कि दलबलसमेत केशव आ गये ।
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आते ही जब केशव ने भूमिष्ठ होकर उन्हें प्रणाम किया, तब उन्होंने भी ठीक वैसे ही भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया और कुछ देर बाद सिर उठाया । उस समय वे समाधिमग्न थे - कह रहे थे –
"कलकत्ते भर के आदमी इकट्ठे कर लाये हैं । इसलिए कि मैं व्याख्यान दूँगा ! व्याख्यान-आख्यान मैं कुछ न दे सकूँगा । देना हो तो तुम दो । यह सब मुझसे न होगा ।“
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उसी अवस्था में दिव्य भाव से जरा मुस्कराकर कह रहे हैं -
"मैं बस भोजन-पान करूँगा और पड़ा रहूँगा । मैं भोजन करूँगा और सोऊँगा – बस । यह सब मैं न कर सकूँगा । करना हो तो तुम करो । मुझसे यह सब न होगा ।"
केशवबाबू देख रहे हैं और श्रीरामकृष्ण भाव से भरपूर हो रहे हैं । एक-एक बार भावावेश में 'अ: अः' कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण की उस अवस्था को देखकर मैं सोच रहा था 'यह ढोंग तो नहीं है ? ऐसा तो मैंने और कभी देखा ही नहीं ।' और मैं जैसा विश्वासी हूँ, यह तो तुम जानते ही हो !
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समाधि-भंग के पश्चात् केशवबाबू से उन्होंने कहा - "केशव, एक दिन मैं तुम्हारे यहाँ गया था, मैंने सुना, तुम कह रहे हो, 'भक्ति की नदी में गोता लगाकर हम लोग सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरेंगे ।' तब मैंने ऊपर देखा, (जहाँ केशवबाबू और ब्राह्मसमाज की स्त्रियाँ बैठी थीं) और सोचा, तो फिर इनकी क्या दशा होगी ? तुम लोग गृहस्थ हो, एकदम किस तरह सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरोगे ? तुम लोग तो उस नेवले की तरह हो जिसकी दुम में कंकड़ बाँध दिया गया हो; कुछ हुआ नहीं कि झट वह ताक पर जा बैठता है; परन्तु वहाँ रहे किस तरह ? 
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कंकड़ नीचे की ओर खींचता है और उसे कूदकर नीचे आना पड़ता है । तुम लोग इसी तरह कुछ काल के लिए जप-ध्यान कर सकते हो, परन्तु दारा और सुतरूपी कंकड़ जो पीछे लटका हुआ नीचे की ओर खींच रहा है, वह नीचे उतारकर ही छोड़ता है । तुम लोगों को तो चाहिए भक्ति की नदी में एक बार डुबकी लगाकर निकलो, फिर डुबकी लगाओ और फिर निकलो । इसी तरह करते रहो । एकदम तुम लोग कैसे डूब सकते हो ?"
केशवबाबू ने कहा - "क्या गृहस्थों के लिए यह बात असम्भव है ? महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ?"
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परमहंसदेव ने दो-तीन बार 'देवेन्द्रनाथ ठाकुर, देवेन्द्र, देवेन्द्र' कहकर उन्हें लक्ष्य करके कई बार प्रणाम किया, फिर कहा –
"सुनो, एक के यहाँ देवी-पूजा के समय उत्सव मनाया जाता था, सूर्योदय के समय भी बलि चढ़ती थी और अस्त के समय भी । कई साल बाद फिर वह धूम न रह गयी । एक दूसरे ने पूछा - 'क्यों महाशय, आजकल आपके यहाँ वैसी बलि क्यों नहीं चढ़ायी जाती ?' उसने कहा, 'अजी, अब तो दाँत ही गिर गये !' देवेन्द्र भी अब ध्यान-धारणा करता है – करेगा ही ! परन्तु बड़ी शान का आदमी है - खूब मनुष्यता है उसमें ।
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"देखो, जितने दिन माया रहती है, उतने दिन आदमी कच्चे नारियल की तरह रहता है । नारियल जब तक कच्चा रहता है, तब तक यदि उसका गूदा निकालना चाहो तो गूदे के साथ खोपड़े का कुछ अंश छिलकर जरूर निकल आयगा । और जब माया निकल जाती है तब वह सूख जाता है, - नारियल का गोला खोपड़े से छूट जाता है, तब वह भीतर खड़खड़ाता रहता है, आत्मा अलग और शरीर अलग हो जाता है, फिर शरीर के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
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"यह जो 'मैं' है, यह बड़ी बड़ी कठिनाईयाँ लाकर खड़ी कर देता है । क्या यह 'मैं' दूर होगा ही नहीं ? देखा कि उस टूटे हुए मकान पर पीपल का पेड़ पनप रहा है, उसे काट दो, फिर दूसरे दिन देखो, उसमें कोंपल निकल रही है, - यह 'मैं' भी इसी तरह का है । प्याज का कटोरा सात बार धोओ, परन्तु उसकी बू जाती ही नहीं !"
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न जाने क्या कहते हुए उन्होंने केशवबाबू से कहा - "क्यों केशव, तुम्हारे कलकत्ते में, सुना, बाबू लोग कहते हैं, 'ईश्वर नहीं है ।' क्या यह सच है ? बाबूसाहब जीने पर चढ़ रहे हैं, एक सीढ़ी पर पैर रखा नहीं कि 'इधर क्या हुआ' कहकर गिरे अचेत, फिर पड़ी डाक्टर की पुकार, जब तक डाक्टर आवे-आवे तब तक बन्दे कूच कर गये ! और ये ही लोग कहते हैं कि ईश्वर नहीं हैं !"
(क्रमशः)

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