गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४५/४८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४५/४८*
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*एक गुरु है आरसी, शिष चख अटके वार१ ।*
*जन रज्जब चश्मा गुरु, काढै अपने पार२ ॥४५॥*
४५-४६ में गुरु और सद्गुरु का परिचय दे रहे हैं - दर्पण१ में तो नेत्र रुक जाते हैं, दर्पण के पार की वस्तु नहीं देख पाते, चश्मा से नेत्र आगे२ की वस्तुओं को भी देखते हैं । वैसे ही साधारण गुरु तो शिष्य को अपने शरीरादि की सेवा में लगा लेता है शिष्य उसी में रुक जाता है, ईश्वर उपासनादि द्वारा आगे बढ़ कर ब्रह्म साक्षात्कार नहीं कर पाता । और सद्गुरु ज्ञान द्वारा शिष्य को आगे बढ़ाकर परब्रह्म का साक्षात्कार करा देता है ।
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*शब्द शीत गुरु जल मही१, अति गति२ निर्मल माँहिं ।*
*तिन में दीसे परे का, वैला३ दीसे नाँहिं ॥४६॥*
पृथ्वी१ में पड़े किंचित जल में शब्द, शीतलता, गंभीरता, निर्मलता नहीं होती और न दूर की वस्तु ही दिखती, अपने भीतर की वस्तु दिखती है, किन्तु अति गहरे२ जल में शब्द, शीतलता, गंभीरता निर्मलता और प्रतिबिम्ब रूप से दूर के वृक्षादि भी दिखते हैं । वैसे ही साधारण गुरु आत्म - ज्ञानयुक्त शब्द, क्षमारूप शीतलता स्वभाव की गंभीरता, निर्मलता नहीं होती । उसके द्वारा पास३ का मायिक संसार स्वर्गादि वा मायिक मूर्तियाँ ही ईश्वर रूप से दिखाई जाती हैं, माया से परे परब्रह्म को वह नहीं दिखा सकता । सद्गुरु में आत्म-ज्ञानयुक्त शब्द, क्षमारूप शीतलता, अति गंभीरता, निर्मलता होती है, उनके द्वारा पास३ की मायिक मूर्तियाँ परब्रह्म रूप नहीं भासती, वे माया से परे परब्रह्म को ही ध्येय ज्ञेय रूप से बताते हैं ।
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*वित१ वोहित२ सब साह का, सद्गुरु खेवण हार ।*
*धन धणी३ के हि जायगा, रज्जब उतरे पार ॥४७॥*
४७-५१ में गुरु का अधिकार बता रहे हैं - जहाज२ में धन१ तो साहुकार का ही होता है, केवट का नहीं । समुद्र के तट पर पहुँचने पर धन स्वामी३ के ही जायेगा । केवट को केवल उताराई ही मिलेगी । वैसे ही जीवात्मा तो परमात्मा का अंश है, परमात्मा में ही जायगा, उसे गुरु अपनी उपासना में लगावे तो, यह गुरु का प्रमाद है । गुरु को चाहिये कि शिष्य से अपने अधिकार की सेवा लेते हुये उसे ज्ञान द्वारा संसार से पार करके परब्रह्म से मिलावे ।
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*जे काजी काईन१ पढे, तो कुछु खसम न होय ।*
*रज्जब व्याह कराय कर, ब्राह्मण बींद न कोय ॥४८॥*
यदि काजी निकाह१ पढ़ता है और ब्राह्मण व्याह कराता है तो क्या, ये दोनों संबंध पद्धति को पढ़ते हुये उस के द्वारा संबंध कराने से लडकी के स्वामी तो नहीं बन सकते, अपनी दक्षिणा ही लेते हैं, लडकी तो वर को ही प्राप्त होती है । वैसे ही गुरु शिष्य का परमात्मा से संबंध कराता है, शिष्य को परमात्मा की उपासना करनी चाहिये, उपकार प्रर्दशानार्थ गुरु की भी सेवा करनी चाहिये । परमात्मा की उपासना छुडाकर अपनी उपासना कराना गुरु का अधिकार नहीं ।
(क्रमशः)

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