गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

*अदया ॥*


🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू गल काटैं कलमा भरैं, अया विचारा दीन ।*
*पंचों वक्त नमाज गुजारैं, साबित नहीं यकीन ॥*
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*अदया ॥*
अैसा रे मति ज्ञान बिचारै । एकहि कौं दूजा करि मारै ॥टेक॥
जौ तैं पाठ पढ्या रे भाई, सो पाठ सही ले बोडैगा ।
दाँतण फाड़्याँ लेखा लेगा, तो गल काट्याँ क्यौं छोड़ैगा ॥
धोये हाथ पाँव भी धोये, मैल रह्या दिल मांहीं ।
अलह बिसमला करि काटण लागा, साहिब का डर नांहीं ॥
बेमिहराँ कौं मिहर न आवै, स्वाद न छोडै कोई । 
अलह राम बषनां यौं बोल्या, भिस्त कहां थैं होई ॥६२॥
हे प्राणी ! ऐसा ज्ञान मत सीख जिसके सीखने से सचराचर में परिव्याप्त एक ही परमात्मा को अपने से भिन्न मानकर मारा जाता है । अद्वैत वेदान्तानुसार सचराचर में एक ही परमात्मा परिव्याप्त है । शरीरों की भिन्नता से ही वह भिन्न-भिन्न सा लगता है किन्तु वह भिन्न है नहीं क्योंकि जैसे ही शरीर रूपी उपाधि का नाश होता है, वैसे ही व्यष्टि और समष्टि चैतन्य का भेद समाप्त हो जाता है । “ब्रह्मसत्य जगन्मिथ्या जीवौ ब्रह्मैव नापरः ॥” 
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हे प्राणी ! तूने जो अभी तक जीवों को मारकर खाने की शिक्षा प्राप्त की है, वह शिक्षा तुझे निश्चय ही डुबायेगी = नरकों में ले जायेगी । क्योंकि परब्रहम-परमात्मा परम न्यायकारी है । उसके यहाँ राई राई का हिसाब लिखा जाता है । हे प्राणी ! विचारकर जब परमत्मा वृक्ष में से दाँतों को माँजने के लिये तोड़ी गई दाँतुन तक का हिसाब लेता है तब जीवों की गले काटकर की गई हिंसा का हिसाब क्यों नहीं लेगा ? निश्चय ही लेगा !
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(विकल्प से इसका अर्थ होगा, जब यह परमात्मा दाँतों को फाड़ने अर्थात् किसी के ऊपर हँसने तक का हिसाब लेता है तब किसी की हत्या करने पर बिना दण्ड दिये हत्यारे को क्यों छोड़ेगा ।) हे मोमिन ! नमाज पढ़ने के पूर्व तू हाथ तथा पावों को तो धोता है किन्तु हृदय में से कल्मषों को साफ नहीं करता है, उसमें दोष-दुर्गुण विद्यमान रह ही जाते हैं । 
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जिसके कारण अल्लाह का नाम लेकर अन्य जीवों को काटने का विसमिल्ला = प्रारंभ दिन-प्रतिदिन करता रहता है । तुझे ऐसा करते समय परमात्मा का जरा सा भी डर नहीं लगता है कि वह इन हिंसाजन्य पापों का फल मरने पर तुझे अवश्य भुगतायेगा । 
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बषनांजी कहते हैं, इन निर्दइयों को दया बिल्कुल भी नहीं आती है क्योंकि ये जिव्हा के स्वाद को नहीं छोड़ते हैं । हिंसा करते समय अल्लाह अथवा राम बोलने मात्र से इन्हें भिश्त = स्वर्ग = मुक्ति कैसे मिल सकती है क्योंकि इनका न तो आचरण ही और न भाव ही पवित्र है । 
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बिना पवित्र भाव के लिया गया भगवन्नाम न्यूनातिन्यून मात्रा में ही लाभ पहुँचा पाता है जो पापों की तुलना में अत्यधिक कम होता है ॥६२॥ 
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये । 
भावोहि विद्यते देवो तस्माद्भावोहि कारणं ॥” 
“भाव वस्य भगवान सुख निधान करुणाभवन । 
आय गयउं हनुमान, जिमि करुणा महँ वीररस ॥” 
वस्तुतः प्राधान्य भाव का ही है ॥     
(क्रमशः)

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