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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ९/१२*
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संतनि हि तें पाइये, राम मिलन कौ घाट ।
सहजैं ही खुलि जात है, सुन्दर हृदय कपाट ॥९॥
प्रभु साक्षात्कार का मार्ग(= घाट, उपाय) केवल साधुओं के सङ्ग से ही प्राप्त होना सम्भव है । सत्सङ्गति का यही प्रभाव है कि इस के कारण साधक का अज्ञान(अविदधा) नष्ट होकर प्रभुसाक्षात्कार हेतु उसके ज्ञानकपाट स्वतः ही खुल जाते हैं ॥९॥
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संत मुक्ति के पौरिया, तिनसौं करिये प्यार ।
कुंची उनकै हाथ है, सुन्दर खोलहिं द्वार ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सन्त जन मुक्तिद्वार(मोक्षद्वार) के पहरेदार हैं । तुम्हारे भवबन्धन से मुक्ति की चाबी(उपाय = ज्ञान) इन ही के पास है । इन की कृपा(अनुकम्पा) यदि तुम पर हो जायगी तो ये तत्काल ही तुम्हारे लिये उक्त मुक्तिद्वार खोलने में सर्वथा समर्थ हैं ॥१०॥
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सुन्दर साधु दयाल हैं, कहैं ज्ञान संमुझाइ ।
पात्र बिना नहिं ठाहरै, निकसि निकसि करि जाइ ॥११॥
साधुजन तो दयालु हृदय होते है । वे प्रत्येक जिज्ञासु को ज्ञान का ही उपदेश करते हैं, परन्तु उसको ग्रहण कर तदनुसार आचरण जिज्ञासु की पात्रता पर निर्भर है । जैसे पात्र में ही जल ठहरता है कुपात्र(फूटे पात्र) में नहीं; वैसे ही जिज्ञासु यदि पात्र(सद्गुणयुक्त) है तो वह ज्ञान ग्रहण करने का अधिकारी है और यदि कुपात्र(दुर्गुणमय) है वह सन्त से ज्ञानोपदेश प्राप्त करके भी उस का क्या लाभ पा सकेगा ! ॥११॥
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सुन्दर साधु सदा कहैं, भक्ति ज्ञान बैराग ।
जाकै निश्चय ऊपजै, ताकै पूरन भाग ॥१२॥
महाराज कहते हैं - सन्त जन तो सदा सब को ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का ही उपदेश करते हैं; परन्तु श्रोताओं में जो भाग्यवान् होगा वही उस उपदेश पर आचरण कर भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ सकेगा ॥१२॥
संतनि हि तें पाइये, राम मिलन कौ घाट ।
सहजैं ही खुलि जात है, सुन्दर हृदय कपाट ॥९॥
प्रभु साक्षात्कार का मार्ग(= घाट, उपाय) केवल साधुओं के सङ्ग से ही प्राप्त होना सम्भव है । सत्सङ्गति का यही प्रभाव है कि इस के कारण साधक का अज्ञान(अविदधा) नष्ट होकर प्रभुसाक्षात्कार हेतु उसके ज्ञानकपाट स्वतः ही खुल जाते हैं ॥९॥
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संत मुक्ति के पौरिया, तिनसौं करिये प्यार ।
कुंची उनकै हाथ है, सुन्दर खोलहिं द्वार ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सन्त जन मुक्तिद्वार(मोक्षद्वार) के पहरेदार हैं । तुम्हारे भवबन्धन से मुक्ति की चाबी(उपाय = ज्ञान) इन ही के पास है । इन की कृपा(अनुकम्पा) यदि तुम पर हो जायगी तो ये तत्काल ही तुम्हारे लिये उक्त मुक्तिद्वार खोलने में सर्वथा समर्थ हैं ॥१०॥
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सुन्दर साधु दयाल हैं, कहैं ज्ञान संमुझाइ ।
पात्र बिना नहिं ठाहरै, निकसि निकसि करि जाइ ॥११॥
साधुजन तो दयालु हृदय होते है । वे प्रत्येक जिज्ञासु को ज्ञान का ही उपदेश करते हैं, परन्तु उसको ग्रहण कर तदनुसार आचरण जिज्ञासु की पात्रता पर निर्भर है । जैसे पात्र में ही जल ठहरता है कुपात्र(फूटे पात्र) में नहीं; वैसे ही जिज्ञासु यदि पात्र(सद्गुणयुक्त) है तो वह ज्ञान ग्रहण करने का अधिकारी है और यदि कुपात्र(दुर्गुणमय) है वह सन्त से ज्ञानोपदेश प्राप्त करके भी उस का क्या लाभ पा सकेगा ! ॥११॥
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सुन्दर साधु सदा कहैं, भक्ति ज्ञान बैराग ।
जाकै निश्चय ऊपजै, ताकै पूरन भाग ॥१२॥
महाराज कहते हैं - सन्त जन तो सदा सब को ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का ही उपदेश करते हैं; परन्तु श्रोताओं में जो भाग्यवान् होगा वही उस उपदेश पर आचरण कर भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ सकेगा ॥१२॥
(क्रमशः)

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