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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास ।*
*गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*दुःखी जीव तथा नरेन्द्र का उपदेश*
नरेन्द्र गा रहे हैं । गाते हुए रवीन्द्र को मानो उपदेश दे रहे हैं ।
गाने का भाव - "तुम मोह और कुमन्त्रणाएँ छोड़ उन्हें समझो, तुम्हारी सम्पूर्ण व्यथा इस तरह दूर हो जायेगी ।" नरेन्द्र फिर गा रहे हैं –
"पी ले अवधूत, हो मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।
बाल अवस्था खेलि गँवायो, तरुण भयो नारीबस का रे,
वृद्ध भयो कफ वायु ने घेरा, खाट पड़ो रह्यो शाम-सकारे ॥
नाभि-कमल में है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशु का रे;
बिन सद्गुरु नर ऐसहि ढूँढै, जैसे मिरिग फिरै वन का रे ॥"
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कुछ देर बाद सब गुरुभाई काली तपस्वी के कमरे में आकर बैठे । गिरीश का बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र, ये दो नयी पुस्तकें आयी हैं । नरेन्द्र, शशी, राखाल, प्रसन्न, मास्टर आदि बैठे हैं । नये मठ में जब से आना हुआ है, तब से शशी श्रीरामकृष्ण की पूजा और उन्हीं की सेवा में दिनरात लगे रहते हैं । उनकी सेवा देखकर दूसरों को आश्चर्य हो रहा है । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय वे दिनरात जिस तरह उनकी सेवा किया करते थे, आज भी उसी तरह अनन्यचित्त होकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते हैं ।
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मठ के एक भाई बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । स्वरसहित जरा व्यंग के भाव से चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । नरेन्द्र ने उनसे पुस्तक छीन ली और कहा - 'इस तरह कोई अच्छी चीज को भी मिट्टी में मिलाता है ?' नरेन्द्र स्वयं चैतन्यदेव के 'प्रेम-वितरण' की कथा पढ़ रहे हैं ।
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मठ के एक भाई - मैं कहता हूँ, कोई किसी को प्रेम दे नहीं सकता ।
नरेन्द्र - मुझे तो श्रीरामकृष्णदेव ने प्रेम दिया है ।
मठ के भाई - अच्छा, क्या सचमुच ही तुम्हें प्रेम दिया है ?
नरेन्द्र - तू क्या समझेगा ! तू (ईश्वर के) नौकरों के दर्जे का है । मेरे सब पैर दाबेंगे, - शरता मित्तर और देसो भी । (सब हँसते हैं) तू शायद यह सोच रहा है कि तूने सब कुछ समझ लिया ? (हास्य)
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मास्टर - (स्वगत) - श्रीरामकृष्ण ने मठ के सभी भाइयों के भीतर शक्ति का संचार किया है, केवल नरेन्द्र के भीतर ही नहीं । बिना इस शक्ति के क्या कभी कामिनी और कांचन का त्याग हो सकता है ?
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दूसरे दिन मंगल है, १० मई । आज महामाया की पूजनतिथि है । नरेन्द्र तथा मठ के सब भाई आज विशेष रूप से जगन्माता की पूजा कर रहे हैं । पूजा-घर के सामने त्रिकोण यन्त्र की रचना की गयी, होम होगा । नरेन्द्र गीता-पाठ कर रहे हैं ।
मणि गंगा-स्नान को गये । रवीन्द्र छत पर अकेले टहल रहे हैं । स्वरसमेत नरेन्द्र स्तवन पढ़ रहे हैं, रवीन्द्र वहीं से सुन रहे हैं -
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ॐ मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुर्न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
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रवीन्द्र गंगा-स्नान करके आ गये, धोती भीगी हुई है ।
नरेन्द्र - (मणि के प्रति, एकान्त में) - यह देखो, नहाकर आ गया, अब इसे संन्यास दे दिया जाय तो बहुत अच्छा हो !
(नरेन्द्र और मणि हँसते हैं)
प्रसन्न ने रवीन्द्र से भीगी धोती उतारने के लिए कहा, साथ ही उन्होंने एक गेरुआ वस्त्र भी दिया ।
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नरेन्द्र - (मणि से) - अब वह त्यागियों का वस्त्र पहनेगा ।
मणि - (हँसकर) - किस चीज का त्याग ?
नरेन्द्र - काम-कांचन का त्याग ।
गेरुआ वस्त्र पहनकर रवीन्द्र एकान्त में काली तपस्वी के कमरे में जाकर बैठे । जान पड़ता है कि कुछ ध्यान करेंगे ।
(क्रमशः)
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