सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

सूरत गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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सूरत गमन ~
वि. सं. १९७० में आचार्य दयारामजी महाराज सूरतनगर में पधारे । वहाँ सेवकों और स्थान धारी संतों ने आचार्यजी की श्रद्धा पूर्वक की और सूरत में रहे तब तक भावपूर्वक दादूवाणी के प्रवचन सुनते रहे । दादूवाणी सूरतनगर के सत्संगियों को बहुत प्रिय लगती थी । सूरत के भक्तों की सत्संग की इच्छा पूर्ण करके आचार्यजी बम्बई नगरी को जाने लगे । तब सूरत नगर के संत तथा भक्तों ने आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट देकर सूरत से सस्नेह विदा किया ।
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बम्बई पधारना ~ 
सूरत नगर से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज बम्बई नगरी को पधारे । बम्बई नगरी के सेवकों ने आपका अति सम्मान किया । अच्छे स्थान में ठहराकर सेवा का सुचारु रुप से प्रबन्ध कर दिया । दादूवाणी का प्रवचन होता था । सत्संगी सज्जन अति प्रेम से श्रवण करते थे । आप बम्बई में जितने दिन रहे उतने ही दिन वहां के सेवक आपके पास आकर सत्संग करते रहे और अपने को धन्य समझते रहे । फिर बम्बई से पधारने लगे तब वहां के सेवकों ने आपका अति सम्मान करते हुये श्रद्धा भक्ति से भेंटें देकर आपको विदा किया । बम्बई से विदा होकर आप नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये । 
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जयपुर नरेश का आगमन ~ वि. सं. १९७१ के भाद्रपद की शुक्ला १४ को जयपुर नरेश माधवसिंहजी दोनों लालजी, सेठ रामनाथजी अटल, नायब नथमल के साथ दादूद्वारे में पधारे । मंदिर में गद्दी पर विराजे हुये आचार्य दयारामजी महाराज को भेंट करके प्रणाम किया । फिर सामने बैठकर प्रसाद ग्रहण किया तथा वार्तालाप किया । 
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फिर स्टेशन पर डेरे में चले गये । शाम को स्टेशन पर डेरे में दादूद्वारे के भंडारियों को बुलाकर रसोई का निमंत्रण दिया । दूसरे दिन नाजिम निजामत के इन्तजाम में रसोई कराई । नाजिम आदि ने सस्नेह सब संतों के साथ आचार्यजी को जिमाया और मर्यादानुसार भेंट दी । महाराजा के लिये प्रसाद भेजा गया । महाराजा ने श्रद्धा पूर्वक  प्रसाद ग्रहण किया ।
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कलकत्ता पधारना ~ 
वि. सं. १९७२ के चैत्र मास में सेवकों के आग्रह से आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित कलकत्ता के सेवकों ने आपको अच्छे स्थान में ठहरा कर सेवा का सब प्रकार का प्रबन्ध कर दिया । जहां ठहरे थे वहां ही दादूवाणी का प्रवचन होता था । सेवक लोग श्रवण करने आते थे । जिसको कोई शंका होती तो उसका भी समाधान आचार्यजी कर देते थे । सेवक लोग आचार्यजी के दर्शन से तथा दादूवाणी के प्रवचन के श्रवण से महान् सुख प्राप्त करते थे । 
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कोई कोई आचार्यजी को शिष्य मंडल सहित भोजन कराने मर्यादापूर्वक  घर ले जाता था और जिमाके भेंट देकर मर्यादापूर्वक ही स्थान पर पहुँचा देता था । इस प्रकार कलकत्ता महानगर में अपने चार मास से भी कुछ ऊपर ही निवास किया । फिर चातुर्मास का समय आने से चलने का विचार किया । सेवकों ने तो कहा चातुर्मास यहाँ ही कीजिये किन्तु पहले माना हुआ था अत: अधिक नहीं ठहर सके । कलकत्ता के सेठ साहूकारों ने आपको श्रद्धा पूर्वक भेंटें दीं और सस्नेह विदा किया । 
(क्रमशः)

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