सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

२०. विपर्यय कौ अंग १७/२०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग १७/२०
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रजनी मैं दीसै दिवस, दिन मैं दीसै राति । 
सुन्दर दीपक जल गयौ, रही बिचारी बाति ॥१७॥
साधना के प्रसङ्ग में, कुछ समय बाद, साधक के साथ ऐसा घटित हुआ कि उसे रात्रि(सांसारिक निवृत्ति) में दिन(ज्ञान का प्रकाश) दिखायी देने लगा । मोह ममता रूप तैल से पूर्ण(दीपक) बुझ गया, उस समय केवल बाती(ब्रह्मानन्दरूप वृत्ति) ही अवशिष्ट रह गयी ॥१७॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ११ पूर्वार्ध) ॥
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सुन्दर बरिखा अति भई, सूकि गये नदि नार । 
मेर बूडि जल मैं रह्यौ, झर लाग्यौ इकसार ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक द्वारा अभ्यास करते करते साधना(वर्षा) से निरन्तर भजन एवं अनाहत नादध्वनि बढ़ने लगी और अहङ्कार रूप सुमेरु पर्वत डूब गया; परन्तु लौकिक नदी नाले(इन्द्रियों द्वारा प्रवाहित होने वाले विषय-भोग) सूख गये(नष्ट हो गये) । यद्यपि यह आनन्दवर्षा निरन्तर हो रही थी ॥१८॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १२ पूर्वार्थ) ॥
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कांसा पर्यौ पराकिदे, बिजली ऊपर आइ । 
घर की सब टाबर मुवौ, सुन्दर कही न जाइ ॥१९॥
लोक में हम देखते हैं कि आकाश से बिजली किसी कांस्य पात्र पर गिरती है; परन्तु यहाँ उलटा हुआ कि कांस्य पात्र(काया, शरीर = लौकिक विषयभोगों का पात्र) ही गुरुजान रूप बिजली पर 'फडाक्' शब्द करता हुआ तत्काल जा गिरा । उस का परिणाम यह हुआ कि साधक की समस्त शुभाशुभ संस्कार रूप(बाल बच्चे = टाबर) मलिन अन्तःकरण की वृत्तियाँ निरुद्ध हो गयीं । इस का स्पष्ट वर्णन सब के लिये सम्भव नहीं है - ऐसा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं ॥१९॥ ॥१३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १२) ॥
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सुन्दर माली नीपज्यौ, फल अरु फूल समेत । 
हाली के कोठा भरे, सूके बाडी खेत ॥२०॥
कुछ अन्य आश्चर्यमय घटनाएँ सुनिये - इस बाड़ी(खेत) रूप कर्मक्षेत्र में क्षेत्रज्ञ जीवरूप माली फल फूल(नाना विषय भोगों) सहित उत्पन्न हुआ । इस कृषिरूप क्षेत्र(देह) में हाली(हलधर = किसान) के अन्तःकरण या मन के कोठे(अन्तरङ्ग वृत्तियों के स्थान) ब्रह्मानन्द से परिपूर्ण हो गये । परिणामस्वरूप, काया रूप खेत सूख गये । अर्थात् अन्तःकरण की वृत्तियाँ अन्तर्मुख होने से साधक का मन ब्रह्मानन्दरूप सच्चे फल-फूलों से परिपूर्ण हो गया । और बहिमुर्खता से हट कर निरञ्जन निराकार के ध्यान में सतत मग्न हो गया ॥२०॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १३) ॥
(क्रमशः) 

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