🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू नाहर सिंह सियाल सब, केते मुसलमान ।*
*माँस खाइ मोमिन भये, बड़े मियां का ज्ञान ॥*
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*अदया ॥*
फुरमाया रे फुरमाया रे भाई ।
खाण मतै अैसी मनि आई ॥टेक॥
आपण मारि आपण ही खावै,
पैकंबर नैं दोष लगावै ।
रोजा धर्या निवाज गुजारी,
साँझ पड्याँ थैं मुरगी मारी ॥
बेमीहार कौं मिहर न आवै,
गलै परायै छुरी चलावै ।
बषनां बहुत हिरस के घाले,
भिस्त छोड़ि दोजग कूँ चाले ॥६१॥
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पैगम्बर साहब ने कुरान में फरमाया है, पक्की तौर पर फरमाया है कि खाने के लिये ही मनुष्य के मन में हिंसा करने की इच्छा जागृत होती है और वह निरीह जीवों को मारकर खाता है । मनुष्य स्वयं ही जीवों को मारकर स्वयं ही खा जाता है । ऊपर से पैगम्बर साहब को दोष लगाता है कि पैगम्बर साहब ने बकरा काटकर खाने का आदेश कुरान में फरमाया है ।
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मुसलमान उपवास करते हैं, नमाज पढ़ते हैं (अल्लाह की इबादत करते हैं) किन्तु संध्या होते ही मुरगे काटकर खाते हैं । इन निर्दइयों को इन निरपराध मूक जीवों पर नाममात्र की भी दया नहीं आती । अपनी जिव्हा के स्वाद की पूर्ति हेतु ये अन्य जीवों के गले पर छुरी चलाकर उन्हें मार डालते हैं ।
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बषनांजी कहते हैं, अत्यधिक हिरस = तृष्णा के घाले = उपजा लेने के कारण ऐसे निर्दयी लोग स्वर्ग जाने के बजाय नरक जाने की तैयारी कर लेते हैं, नर्कों में जाते हैं ॥६१॥
(क्रमशः)

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