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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग २९/३२
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सुन्दर सब ही सौं मिली, कन्या अखन कुमारि ।
बेश्या फिरि पतिब्रत लियौ, भई सुहागनि नारि ॥२९॥
पहले असंस्कृत जिज्ञासु की अपरिपक्व(= अखन) बुद्धि रूप कन्या इस गुरु से उस गुरु के पास या इस शास्त्र से उस शास्त्र को और घर घर जा कर वेश्या के समान सबसे मिलती जुड़ती थी । परन्तु जब उसने अपनी ज्ञानपिपासा की तृप्ति के लिये सच्चे गुरु की खोज की तब उसे पतिव्रता धर्म की सिद्धि मिली और वह सुहागन नारी कहलायी अर्थात् उसे लययोग(समाधि) द्वारा अद्वैत निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार हुआ ॥२१॥ (द्र० - सवैया छ० सं० २२/२०) ॥
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कलिजुग मैं सतजुग कियौ, सुन्दर उलटी गंग ।
पापी भये सु ऊबरे, धरमी हूये भंग ॥३०॥
तब उस जिज्ञासु की ऐसी स्थिति हो गयी कि मानो उस की मलिन कर्मों से युक्त काया में कलियुग के स्थान पर सतयुग का ही उद्भव हो गया । इसने राजा भगीरथ के समान ज्ञानगङ्गा का प्रवाह उलटा कर दिया; जिससे वह इन्द्रियों एवं विषयों का घातक होने से पापी होकर भी ज्ञानी ही कहलाया और भवसागर को पार कर गया । उधर अपनी इन्द्रियों का विषयभोगों से पालन पोषण करने वाले सांसारिक जीव धर्मी कहलाये; परन्तु उनके भवसागर में डूबते उतराते रहने से अन्त में उनका नाश ही हुआ ३०॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० २०) ॥
विप्र रसोई करत है, चौकै काढी कार ।
लकरी मैं चूल्हा दियौ, सुन्दर लगी न बार ॥३१॥
एक अन्य विपर्यय सुनिये - वेदादिशास्त्रों के ज्ञाता किसी विप्र(ज्ञानी पुरुष = जीव) ने भोजन, रसोई(ज्ञानभक्ति) के लिये चौका(अन्तःकरणचतुष्टय में साधनचतुष्टय के लिये बाह्य संसार की निवृत्त के लिये मर्यादा) बना कर लकड़ी(अन्तर्मुखी साधना में तल्लीनता) में चूल्हा(स्वकीय चित्त) को लगा दिया । इतने लम्बे कार्य में उसको कुछ भी विलम्ब(बार) न लगा, वह तत्काल पूर्ण हो गया ॥३१॥ (तु० - क्षिप्रं भवति धर्मात्मा - भगवद्गीता) (द्र० – सवैया : २२/छ० सं० २१) ॥
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रोटी ऊपर पोइकै, तवा चढायौ आंनि।
खिचरी मांहैं हण्डिका, सुन्दर रांधी जांनि ॥३२॥
उसकी पूर्णता में भी विपर्यय देखिये - उस ने रोटी(भगवद्भजन) बनाने के लिये उस पर तवा(तत्त्वज्ञान रूप रक्षा का साधन) रख दिया । उधर उसने खिचड़ी(ज्ञान एवं भक्ति मिश्रित भगवत्प्राप्तिसाधन) में हांडी रूप काया को रांध(लीन कर) दिया । इस से उसकी काया सिद्ध(तेजोमय) हो गयी । सन्त की इसी अवस्था को सन्त रज्जब जी ने "काया भई कपूर" कह कर वर्णित किया है ॥३२॥ (द्र० – सवैया = छ० सं० २२/२१ उत्तरार्ध) ॥
(क्रमशः)

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