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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग २५/२८
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मांस भखै मदिरा पिवै, वह तौ अगम अगाध ।
जो ऐसी करनी करै, सुन्दर सोई साध ॥२५॥
ऐसी ही अन्य साषी । इस का आध्यात्मिक अर्थ यह है - जो साधक मांस भखै - सांसारिक पदार्थों में ममतारूप अमेध्य वासना का भक्षण कर जाय अर्थात् उसे समूल नष्ट कर दे । मदिरा पिवै - साधक मोहमयी मदिरा(मदान्धता) को भी उसी प्रकार पी जाय जैसे शिव ने हालाहल विष पीया था ।
दूसरा अर्थ यह है - भगवत्पदारविन्दमकरन्दयुक्त मधु मदिरा पी कर उन्मत्त हो जाय । उस को पीने से साधक सांसारिक मायामोह से मुग्ध नहीं होता ।
इस साषी में मांस भखै का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है - ज्ञानी सिंह बन कर संसाररूपी पशु का वध करे तथा उस में से ज्ञानरूप मांस को खावे एवं विषयभोगादिक अस्थियों का त्याग कर दे ॥२५॥ (द्र० - सवैया : २२/छन्द सं ० १८) ॥
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जोई ह्वै अत्ति निर्दयी, करै पशुन की घात ।
सुन्दर सोई उद्धरे, और बहे सब जात ॥२६॥
जो साधक विषयरूप चारा चरने वाले पशुतुल्य इन्द्रियों को निर्दयतापूर्वक मार देता है, (निगृहीत कर देता है) या ऐसा जितेन्द्रिय पुरुष ही इस भवसागर को पार कर सकता है । शेष पामर जन तो इस भवसागर में डूबते उतराते हुए जन्ममरणपरम्परा में ही फंसे रहेंगे ॥२६॥ (द्र० सवैया : २२/छ ० सं ० १६ पू०) ॥
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सुन्दर समुझावै बहू, सुनि हे मेरी सास ।
माइ बाप तजि धी चली, अपने पिय के पास ॥२७॥
शुभ गुणों से युक्त शुद्ध बुद्धि रूप बहू अपनी सुरतिरूप सास को समझाती है - "है सास ! मैं(शुद्ध बुद्धि) माता(माया) एवं पिता(देहाध्यास एवं विषयभोगों) को त्यागकर अपने पति(परमात्मा) के पास जा रही है ॥२७॥ (द्र० सवैया : छ.२२/१७) ॥
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बढई कारीगर मिल्यौ, चरखा गढ्यौ बनाइ ।
सुन्दर बहू सतेवरी, उलटौ दियौ फिराइ ॥२८॥
क्योंकि मुझे ऐसा बढई(गुरुदेव) मिल गया कि जिन ने मेरे चित्त रूप काष्ठ का छील(तरास) कर ऐसा चर्खा(सूत कातने का यन्त्र) बना दिया । तथा यह चर्खा मेरी शुद्ध बुद्धि रूप बहू को मिला तो इसने इसको उलटा(विपरीत) फिरा दिया । अर्थात् बहिर्मुख(संसार) से अन्तर्मुख(परमात्मा) की ओर मोड़ दिया ॥२८॥ (द्र०- सवैया : छन्द २२/१९) ॥
(क्रमशः)

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