🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*इस कलि केते ह्वै गये, हिंदू मुसलमान ।*
*दादू सांची बंदगी, झूठा सब अभिमान ॥*
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*साँच ॥*
भाई रे ये दून्यूँ पख दीठा ।
हिन्दू तुरक दहूँ कौं लागै, स्वाद सबनि कौं मीठा ॥टेक॥
रोजा करै निवाज गुजारै, कलमाँ बाँग पुकारै ।
कहौ सबाब कहाँ थैं होइगा, साँझ कौं मुरगी मारै ॥
एकादसी अड़प सौं कीन्हीं, दूध सिघांड़ा सेती ।
अन छाड्यौ इहि मन कै स्वारथी, सागाहार सगोती ॥
तुर्कों की मिहर दया हिंदुवाँ की, दहूँ घटाँ थैं भागी ।
वै जिवह करै वै झटकै मारै, आगि दहूँ कै लागी ॥
जिभ्या स्वारथ आप उपावै, स्वादि बँधाणा मीठै ।
सुखदेव कह्यौ मह्मदि फुरमायौ, सो करणी रही कहींठै ॥
बेद कतेबौं माँहैं लिखिया, सो तौ झूठ न होई ।
साच छिपावै झूठ दिढ़ावै, भरमाया सब लोई ॥
हरि का भगत बरण थैं बाहरि, सो तौ इनकै संगि न जाई ।
बषनां दहूँ पखाँ थैं न्यारा, राम भजन करि भाई ॥६०॥
हे भाई ! हमने दोनों पक्षों = दोनों समुदायों के आचार तथा विचारों के बारे में सम्यक् प्रकार से विचार-विमर्श, चिंतन-मनन कर लिया है तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं की हिन्दू तथा तुरक दोनों ही को जिव्हा से स्वाद लेना प्रिय लगता है; दोनों ही जीवों की हिंसा करके उनका मांस भक्षण करते हैं ।
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मुसलमान लोग रोजा = उपवास करते हैं, निवाज गुजारै = नमाज पढ़ते हैं तथा कलमा = पवित्र मंत्र ‘अल्लाहु अकबर’ को उच्चस्वर में उच्चारित करते हैं । वे ये कार्य सबाब = परलोक में सुख मिलने = मुक्ति मिलने के लिये करते हैं किन्तु उन्हें पुण्य (सबाब) कहाँ से मिलेगा क्योंकि वे तो संध्या होते ही मुर्गी को मारने की हत्या करते हैं और उस तामसी वस्तु मुर्गी के माँस को रांधकर खाते हैं ।
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मुसलमानों की भांति ही हिन्दू एकादशी का व्रत बहुत ही अड़्प = आग्रह के साथ दूध, सिंघाड़े के आटे के हलुवे आदि को खाकर करते हैं । वे अन्न नहीं खाते, शाकाहार तथा मिष्ठानों को खाते हैं । क्योंकि मिष्ठान खाने से मन में प्रसन्नता होती है ।
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वस्तुतः मुसलमानों की मिहर = महरबानी तथा हिन्दुवों का दयाभाव वैचारिक स्तर पर ही दोनों में रह गया है, आचरण में दोनों ही समुदायों में से दयाभाव समाप्त हो गया है क्योंकि मुसलमान जीवों को जिबह = खाने के लिये धीरे-धीरे काटते हैं जबकि हिन्दू झटकै = एक ही बार में जीवों को मारकर खाते हैं ।
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दोनों ही समुदायों में जिव्हा के स्वाद के लिये जीवों को मारने रूपी हिंसा = अग्नि सुलगी हुई है । जिव्हा के स्वाद के लिये दोनों समुदाय स्वयं ही जीवों को पालते तथा काटते हैं क्योंकि दोनों ही जिव्हा के स्वाद के वशीभूत हुए हैं ।
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भागवत् में शुकदेव द्वारा कुरान में मुहम्मद द्वारा जो अहिंसामय विचार तथा आचार की शिक्षा दोनों समुदायों को दी है, वह दोनों में ही कहींठै = कहीं गायब हो चुकी है । वेदों और कतेबौं = कुरान में जो बातें लिखी हुई हैं, वे तो झूँठी हो नहीं सकतीं । अर्थात् वे बातें सर्वथा सही हैं, किन्तु वर्णाश्रमाभिमानी लोग सत्य बातों को न बताकर असत्य बातों पर आस्था दृढ़ करवाते हैं जिससे समस्त जनता भ्रमित हुई पड़ी है ।
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जो हरि = परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के भक्त होते हैं वे वर्ण-जाति के ऊपर होते हैं, वर्णातीत होते हैं । वे इन जाति-वर्णाश्रमाभिमानी लोगों के साथ नहीं लगते । अर्थात् इनकी बातों को नहीं मानते । बषनां कहता है, ऐसे हरिभक्त रामजी का भजन करके हिन्दू-मुसलमान रूपी दोनों पक्षों से अतीत होते हैं, हो जाते हैं ॥६०॥

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