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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा ।*
*जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥*
*सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी ।*
*दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥*
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*ब्रह्मविचार ॥*
थारै सु म्हारै म्हारै सु थारै । तिहनैं कहौ कौंण जुहारै ॥टेक॥
ठाकुर कै ठकुराणी सेवग कै नारी । इहि लेखै दोन्यूँ घरवारी ॥
ठाकुर चाकर की कृतम काया । जोनी संकुटि दोन्यूँ आया ॥
एक कीड़ी एक कुंजर कीन्हा । कहा भयौ सकती जे दीन्हा ॥
चारि अवस्था अरु त्रिगुण व्याप्यौ । कबहूँ भूखौ कबहूँ धाप्यौ ॥
नहिं सो बिरध नहीं सो बालौ । बषनां कौ ठाकुर राम निरालौ ॥५२॥
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“बोध चाहि जाकों सुकृति, भजत राम निष्काम ।
सो मेरी है आतमा, काकूँ करूँ प्रनाम ॥
विचारसागर, मंगलाचरण दोहा ५ ॥
इस पद की प्रथम पंक्ति में इन्हीं भावों को व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं, जो सुखस्वरूप, नित्यस्वरूप, प्रकाशस्वरूप, विभु, नाम और रूप की आधार, तथा जिसे बुद्धि न जान सके किन्तु बुद्धि को जो जाने ऐसी नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मा ही, हे परमात्मन् तेरे है और जो उक्त आत्मा तेरे है वही मेरे है; अब बता दोनों में कौन किसका वन्दन करे ।
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कहने का आशय है कि हम दोनों आत्मा की दृष्टि से एक हैं । फिर कौन किस को प्रणाम करे । इसके विपरीत ठाकुरजी के ठकुराणी तथा सेवक के सेवकनी पत्नी होती है । अर्थात् सगुणमार्ग में दोनों की सत्ता पृथक-पृथक हैं । इसीलिये ठाकुरजी तथा सेवक दोनों ही घरवारी = मायिक = मिथ्या हैं । ठाकुरजी तथा सेवक-दोनों ही का शरीर कृतम = प्रकृति की विकृति है; दोनों ही माता की योनि के माध्यम से इस संसार-सागर में आते हैं ।
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एक ठाकुरजी को हाथी सदृश बलशाली बनाया है तथा दूसरे जीव को चींटी के समान निर्बल बनाया है । किन्तु है दोनों ही एक । मात्र अंतर है तो शक्ति का ही है किन्तु शक्ति के आधिक्य से क्या तात्पर्य ? क्योंकि दोनों ही की चार अवस्थाएँ होती हैं और दोनों को ही त्रिगुण व्यापते हैं । त्रिगुण व्यापने के कारण दोनों को कभी भूख लगती है तो कभी दोनों ही तृप्त हो जाते हैं ।
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इन उक्त बातों से ध्यान में आता है कि ठाकुरजी तथा सेवकजी दोनों ही विकारी, मायिक हैं जबकि बषनां का ठाकुर रामजी ऊपर वर्णित ठाकुरजी से सर्वथा निराला है जो न कभी वृद्ध होता है, न कभी बालक ही होता है । वह सदैव एकरस = एक जैसा = अविकारी रहता है ।
“जो सुख नित्य प्रकास विभु, नाम रूप आधार ।
मति न लखै जिहिं मति लखै, सो मैं सुद्ध अपार ॥
विचारसागर मंगलाचरण प्रथम दोहा ॥५२॥
(क्रमशः)

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