सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

*१९. साधु कौ अंग ५३/५६ *

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५३/५६ *
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संतनि ही कौ आसरौ, संतनि कौ आधार । 
सुन्दर और कछू नहीं, है सतसंगति सार ॥५३॥
श्रीसुन्दरदासजी साधक को समझा रहे हैं - यदि तूं भगवत्साक्षात्कार(भगवान् के दर्शन) चाहता है तो इसके लिये सत्सङ्गति को अपना आलम्बन(आश्रय या सहारा) बना ले । इस सत्सङ्गति के सम्मुख अन्य सभी शुभ कर्म महत्त्वहीन है । भगवत्प्राप्ति का यह(सत्सङ्गति) ही सर्वोत्तम उपाय है ॥५३॥
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पावक जारै नीर कौं, नीर बुझावै आगि । 
सुन्दर बैरी परस्पर, सज्जन छूटै भागि ॥५४॥
[अब कुछ उदाहरणों से कुसङ्गति की यथार्थता समझा रहे हैं -] अग्नि को यदि अवसर मिले तो वह जल को उष्ण कर शनैः शनैः उस को नष्ट कर देती है, या जल को अवसर मिले तो वह उस पर गिर कर उसको बुझा देता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सज्जनों को ऐसी दुष्ट सङ्गति से दूर ही रहना चाहिये ॥५४॥
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उलवा मारै काग कौं, काक सु हनै उलूक । 
सुन्दर बैरी परस्पर, सज्जन हंस कहूंक ॥५५॥
ऐसे ही अवसर (रात्रि) मिलने पर उल्लू कौआ को मार देता है या कौआ(दिन में) उल्लू को मार देता है; क्योंकि ये दोनों परस्पर वैरी हैं, अतः दुष्ट हैं । इन के विपरीत हंस को मानिये; क्योंकि वह सज्जन है, अतः उस का कोई वैरी नहीं है ॥५५॥
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै सु नीच । 
चल्यौ अधोगति जाइ है, परै नरक कै बीच ॥५६॥
सन्त की निन्दा का कुफल : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जो पुरुष अकारण 'सन्त' की निन्दा करता है उसे हीन(निकृष्ट) पुरुष ही समझना चाहिये । वह मृत्यु के बाद किसी नीच योनि में जन्म लेगा या वह सीधा नरक में जा गिरेगा ॥५६॥
(क्रमशः)

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