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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग २०/२२*
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सुन्दर सोभै सूरिवाँ, मुख परि बरिखै नूर ।
फौज फटावै पलक मैं, मार करै चकचूर ॥२०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे शूर वीर ही युद्धभूमि में शोभा प्राप्त करते हैं । उनके मुख पर उस समय एक विशेष(दर्शनीय) आभा(कान्ति) झलकने लगती है और क्षणमात्र में ही विशाल सेना को भी नष्ट करने का साहस अपने में ले आते हैं ॥२०॥
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सुन्दर खैंचि कमान कौं, भरि करि मारै बांन ।
जाकै लागै ठौर जिहिं, लेकरि निकसै प्रांन ॥२१॥
उस समय वह अपने धनुष की डोर(प्रत्यञ्चा) को तीव्रता से खींच कर किसी को बाण मारता है तब वह विरोधी उस बाण के लगते ही प्राण त्याग कर यमलोक पहुँच जाता है ॥२१॥
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सुन्दर सील सनाह करि, तोष दियौ सिर टोप ।
ज्ञान षडग पुनि हाथ लै, कीयौ मन परि कोप ॥२२॥
भक्तियोग में शूरता : अब महाराज सुन्दरदासजी इस भक्तियोग के साधक को युद्ध की विधि का उपदेश कर रहे हैं - भक्तियोग का साधक भी अपने शीलव्रत(सदाचार) को कवच(सन्नाह) के रूप में धारण करे, सन्तोष को अपने शिर पर टोप(शिरस्त्राण) के रूप में रखे, तब वह साधक गुरु के ज्ञानोपदेश रूप खड्ग(तलवार) से अपने शत्रु मन पर, उस को एकाग्र करने के लिये, आक्रमण करे ॥२२॥
(क्रमशः)

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