शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५३/५६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५३/५६*
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*आदम१ करि आदम उदय, सीप ही निपजे सीप ।*
*पै मन मुक्ता गुरु इन्द्र करि, सद्गुरु स्वाति समीप ॥५३॥*
मनुष्य१ से मनुष्य और सीप से सीप उत्पन्न होती है किन्तु मन में ज्ञान सद्गुरु के समीप रहकर उपदेश सुनने से और सीप में मोती स्वाति बिन्दु पड़ने से ही होता है ।
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*सद्गुरु श्रावण की कला१, ता में मौज२ सु स्वाति ।*
*तब मोती मन नीपजे, जन रज्जब इहिं भाँति ॥५४॥*
श्रावण के दिनों१ में स्वाति नक्षत्र की बिन्दु से सीप में मोती उत्पन्न होता है, इसी प्रकार सद्गुरु के समीप रहने के दिनों में उपदेश सुनने का आनन्द२ मिलता है, तब मन में ज्ञान उत्पन्न होता है ।
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*जन रज्जब गुरु धरणि पर, शिष सारे वनराय१ ।*
*घट२ प्रमाण३ रस सब पिवें, अपणे अपणे भाय४ ॥५५॥*
५५-५६ में शिष्यों के भाव का परिचय दे रहें हैं - पृथ्वी पर की वन-पंक्तियों१ के वृक्ष अपने आकार और शक्ति२ के समान३ ही जल पान करते हैं । वैसे ही गुरु के आश्रय रहने वाले शिष्य भी सब अन्त:करण की वृत्ति से अपने-अपने भाव४ के समान ही ज्ञान, भक्ति, योगादि के उपदेश रस का पान करतें हैं ।
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*जन रज्जब गुरु ज्ञान जल, सींचे शिष वनराय१ ।*
*लघु दीरध अरु स्वाद विध, ह्वै अंकूर स्वभाय ॥५६॥*
बादल वन-पंक्तियों१ के सभी वृक्षों के बीजों को समान ही जल सींचते हैं किन्तु सबके अंकुर भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं, कोई छोटा, कोई बडा, और कटु मधुरादि स्वाद भी सबके भिन्न भिन्न होते हैं । वैसे ही गुरु तो उपदेश सबको समान ही देते हैं किन्तु शिष्य सभी अपने अपने स्वभाव के अनुसार ही योग्यता प्राप्त करते हैं ।
(क्रमशः)  

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