🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।*
*अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥*
==============
*आत्मनिवेदन ॥*
मींया मेरे अैसा भोजन भावै ।
बीबी बड़ी सालना कीया, ताका टाँक सवाद न आवै ॥टेक॥
खारी हुइ खांड लूण हुवा मीठा, दूध थे काँजी फारा ।
मिसरी माँहैं मेवा भेल्या, खाताँ लागै खारा ॥
सौक्याँ सौकि लड़ाई हूई, दुहुँ मैं एक न लरजै ।
सासूँ का क्यूँह सारा नाँहीं, नाटी नणदल बरजै ॥
ऐकै घर मैं तेरह माणस, सात पुरिष छह नारी ।
पाँच डबोवैं पाँच तिरावैं, येक अचंभा भारी ॥
तेरह पाछैं दोइ भँडारी, पूरा पाँच सवादी ।
तू राखै त्यूँ रहूँ केसवा, जन बषनां अपराधी ॥६४॥
.
मींया = मन । भोजन = विषयभोग । बीबी बड़ी = कुबुद्धि । सालणा = भोजन, विषयभोगों को प्राप्त कराती है, उनमें आसक्ति उत्पन्न करती है । टाँक = तनिक सा । खारी = बुरी, अरुचिकर । खांड = खरा परमात्मा का नाम । लूण = कुकर्म । दूध = मन । काँजी = माया, कर्म । मिश्री = परमात्मा का मीठा नाम । मेवा = अनन्यप्रीति, अनुराग । भेल्या = मिलाया । बुरा = अरुचिकर । सौक्याँ सौकि = सौतों-सौतौं में लड़ाई हुई = सुबुद्धि और कुबुद्धि में आपस में लड़ाई होती है किन्तु उन दिनों में से, न लरजै = कोई भी झुकती नहीं, समझौता नहीं करती है । सारा = सहारा, सहयोग, मदद । क्यूँह = कुछ भी । बरजै = रोके । तेरह माणस = तेरह द्वार । घर = काया । सात पुरिख = ब्रह्मरंध्र, दो कान, दो आँख, दो नासिका । छहनारी = मुख, दो स्तन, नाभि, शिश्नेन्द्रिय और गुदा । भंडारी = मुख तथा शिश्न । सासू = सुरति । नाटी नणदल = नकटी = बेशर्म विषयासक्ति, सुरति-वृत्ति को सहयोग करने से मना करती है । इसीलिये वह असहाय है । तेरह माणस = दूसरे विकल्प के अनुसार पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार । पाँच ज्ञानेन्द्रिय मन और अहंकार पुरुष जबकि पांच कर्मेन्द्रिय व बुद्धि स्त्री हैं । दोइ भँडारी = (विकल्प से), जीव व जीव का मन ।
.
बषनांजी इस पद में अपने आपको विषयी जीव मानते हुए भगवद्भजन न करने के कारण भगवान् का अपराधी मानकर भगवच्छरणागति की याचना करते हैं । उन्होंने अपने विचार सपाट शैली में व्यक्त न करके कूट शैली में व्यक्त किये हैं जिसके लिये प्रतीकों का प्रयोग किया है ।
.
वे आत्मनिवेदन करते हुए कहते हैं, हे केशव ! मेरे विषयी मन रूपी मींया को विषयभोग रूपी भोजन ही रुचिकर लगता है । उसे तेरी भक्ति में जरा भी रूचि नहीं है । सांसारिक विषयों में आसक्त दुष्ट बुद्धि इस मन को नाना भोगों को भोगने के लिये प्रेरित करती है । मन उन भोगों को भोगता है । फिर भी वह उनसे जरा सा भी संतुष्ट नहीं होता तथा और भोग भोगूँ, और भोग भोगूँ, इसी उहापोह में लगा रहता है ।
.
फलस्वरूप उसको आपका खरा = निष्कलंक नाम अरुचिकर लगने लगा है जबकि विषयभोग, माया-धन, नाना सकामकर्म प्रिय लगने लगे हैं । क्योंकि काँजी = माया, कुकर्मों रूपी काँजी ने दूध रूपी मन को फाड़ दिया है, अपने आप में पूर्णरूपेण आसक्त कर लिया है । आपने जीवों के कल्याण के लिये, मेरे कल्याण के लिये भक्ति रूपी मिश्री को मेवा रूपी अनन्य अनुराग के साथ सुलभ करवाया है .....
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ॥”
गीता १८/६५ ॥
किन्तु इस भक्तिरूपी भोजन को खाना = भक्ति की साधना करना सर्वथा खारा = रसहीन = अरुचिकर लगता है ।
.
सुबुद्धि और कुबुद्धि अथवा मन तथा निजमन रूपी सौतों में गंभीर लड़ाई होती है किन्तु दोनों में से कोई भी लड़ाई से विरत नहीं होती । एक दूसरी, एक दूसरी को पछाड़ देने के कुचक्र में ही लगी रहती है किन्तु कोई भी हार मानकर शांत नहीं होती उल्टे पूरे जोश के साथ अनवरत लड़ती रहती हैं । इस लड़ाई में सुरति रूपी सास कुछ भी मदद नहीं कर पाती क्योंकि बेशर्म नणदल रूपी विषयों में आसक्ति सुरति को ऐसा करने के लिये रोकती है । अर्थात् विषयों में आसक्ति इस कदर हो चुकी है कि वह सुरति को कुछ भी मात्रा में सहयोग नहीं करने देती ।
.
इस एक ही घर रूपी शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार रूपी तेरह मनुष्य रहते हैं । जिनमें से सात पुरुष तथा छह स्त्रियाँ हैं । पाँच कर्मेन्द्रिय दुष्कर्म, सकामकर्म करके डुबोने में सहायक बनती हैं जबकि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ सत्संग द्वारा ज्ञान का संपादन करके उबारने का प्रयत्न करती हैं । एक ही घर के सदस्यों का उक्त प्रकार का विपरीत आचरण निसंदेह आश्चर्य उत्पन्न करने वाला है ।
.
इन तेरह मनुष्यों को सहयोग देने वाले मुख तथा शिश्नेन्द्रिय नामक दो आहार लेने वाले भंडारी हैं । जिस प्रकार भंडार का प्रधान सभी को आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराकर संतुष्ट करता है । मन इन्हीं द्वारों के माध्यम से भोगों को भोगता है । ये दोनों द्वार रूप, रस, गंध, स्पर्श व शब्द रूपी पाँचों के पक्के स्वादी हैं । हे केशव ! मैं बषनां उक्त प्रकार का अतीव विषयी होने से आपका अपराधी हूँ । अतः आपको जैसा भी उचित लगे, मेरे लिये वैसा ही करें । क्योंकि मैं आपकी शरण में आ पड़ा हूँ । मैं सर्वथा और सर्वथा आपका हूँ ॥६४॥

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें