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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२९/१३२*
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*सद्गुरु साधु जहाज तज, विरचे मूरख दास ।*
*जन रज्जब हैरान है, कहाँ करेगा बास ॥१२९॥*
जेसे जहाज से विरक्त होकर जहाज को छोड़ दे तो किस पर बैठ कर समुद्र पार करेगा ? वैसे ही यदि श्रेष्ठ सद्गुरु से भी विरक्त होकर उनको त्याग दे तो बड़ा आश्चर्य है, वह प्रभु प्राप्ति रूप अखंड शांति के लिए कहाँ निवास करेगा ।
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*जन रज्जब गुरु साण पर, भूंठी मन तलवार ।*
*तो तीखी कत कीजिये, रे जीव सोच विचार ॥१३०॥*
यदि साण पर चढाने पर भी तलवार तीखी नहीं होती तो कहाँ होगी ? वैसे ही गुरु के उपदेश से भी मन सूक्ष्म नहीं हो सका तो, हे जीव ! सोच विचार कर कह फिर कहाँ सूक्ष्म होगा ?
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*जे पंच रात अंतर पड्या, शिष तरुवर गुरु मेह ।*
*जन रज्जब जोख्यूं१ नहीं, तऊ हरे उस नेह ॥१३१॥*
१३१ में कहते हैं, गुरु का किंचित् वियोग हानिकर नहीं - जैसे पाँच दिन वर्षा न हो तो वृक्ष की हानि१ नहीं होती, वह पूर्व में बर्षे हुये से ही हरा रहता है । वैसे ही यदि कुछ दिन गुरु का वियोग हो भी जाय तो भी शिष्य की हानि नहीं होती वह प्रथम सुने हुये गुरु के उपदेश में स्नेह रखने से ही निर्दोष रहता है ।
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*रज्जब सींचे सद्गुरु, हरि लग हरे सु प्राण ।*
*सदा सुखी सुमिरण करैं, सूखैं नहीं सुजाण ॥१३२॥*
१३२ में गुरु की दया का फल बता रहे हैं - यदि सद्गुरु दया पूर्वक उपदेश - जल से सींचते रहें तो हरि के चिन्तन में लगकर साधक प्राणी प्रसन्नता रूप हरियाली से युक्त ही रहेंगे, हे सुजान ! दु:ख रूप शुष्कता उनमें नहीं आयेगी, कारण - जो हरि स्मरण करते हैं, वे तो सदा ही सुखी रहते हैं ।
(क्रमशः)

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