रविवार, 1 फ़रवरी 2026

३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*
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*माता पिता असंख्य ह्वैं, चौरासी के माँहिं ।* 
*रज्जब यह सौदा घणा, पर सद्गुरु मेला नाँहिं ॥१२५॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में माता-पिता तो असंख्य मिल जाते हैं । अत: स्वजन मिलन रूप व्यापार तो संसार में बहुत अधिक है किन्तु सद्गुरु मिलन दुर्लभ है । 
*युवती जातक योनि बहु, चौरासी के बास ।* 
*जन रज्जब जिव को नहीं, सद्गुरु चरण निवास ॥१२६॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में निवास के समय नारी, पुत्रादि तो बहुत प्राप्त होते हैं, किन्तु वहाँ पर प्राणी को सद्गुरु चरणों में निवास प्राप्त नहीं होता ।
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*मात पिता सुत नारि सौं, विष फल आवे हाथ ।*
*जन रज्जब गुरु की दया, सदा सु सांई साथ ॥१२७॥*
१२७ में माता पिता से गुरु की अधिकता बता रहे हैं - माता, पिता, पुत्र, नारी आदि स्वजनों से विषय रूप विष फल ही मिलता है किन्तु गुरुदेव की दया से सदा के लिये परब्रह्म का साथ मिलता है अर्थात प्राणी परब्रह्म रूप ही हो जाता है । 
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*सद्गुरु साधु न छोडिये, जे तू स्याणा दास ।* 
*रज्जब रहँट कहाँ रहे, जब ना वध ह्वै नास ॥१२८॥* 
१२८-१३० में गुरु-त्याग से हानि होती है यह कह रहे हैं - यदि तू चतुर सेवक है तो श्रेष्ठ सद्गुरु का त्याग कभी न करना । कारण - जैसे बैलों के नासिका में बँधी हुई रस्सी अरहट की हाल की खूंटी के न बंधी हो तो बैल अरहट के पास कहाँ रहेंगे ? मार्ग छोड़ देंगे । वैसे ही श्रेष्ठ सद्गुरु के चरणों में न रहेगा तो, भगवान के पास कहाँ रह सकेगा, वह परमार्थ पथ को छोड़कर संसार में ही जायेगा । 
(क्रमशः)

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