बुधवार, 11 मार्च 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६५/६७*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६५/६७*
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*रोगी को भासे उभय, वैद्यहिं दीसे तीन ।*
*रज्जब ऐसे गुरु शिषहु, कहु सु क्या मिल कीन ॥६५॥*
रोगी को एक से दो दिखे और वैद्य को एक के तीन दिखे तब कहो ? ऐसे वैद्य से रोगी मिलकर अपना क्या भला कर लेगा ? वैसे ही शिष्य से अधिक अज्ञानी गुरु मिल जाये तो ऐसे गुरु शिष्य मिलकर कहो क्या कर लेंगे ? अर्थात दोनों संसार में ही रहेंगे परब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकते ।
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*वैद्य व्यथा बूझे नहीं, पीर न पावे पीर१ ।*
*रज्जब मिलै न नाम गुण, क्यों सु वंदिये वीर२ ॥६६॥*
६६-६७ में अयोग्य गुरु का परिचय दे रहे हैं - वैद्य रोग को न समझ सके और गुरु१ साधक की कठिनता रूप पीड़ा को न समझ सके तो उनमें नाम के अनुरूप गुण तो मिलते नहीं, फिर हे भाई२ ! उन्हें वैद्य ओर गुरु मान कर क्यों वन्दना की जाय ? अर्थात गुरु के लक्षणों बिना गुरु अयोग्य ही माना जाता है ।
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*आशंका अरु घाव, मन मरकट सु दिखाव ही ।*
*अगले मति बिन वानरे, रज्जब ठोर उठाव ही ॥६७॥*
कोई कारण से किसी वानर के घाव हो जाय तो वह दूसरे वानर को दिखाता है, तब देखने वाला वानर यह समझकर कि - यह कोई जन्तु इसके चिपक गया है, घाव को उखाड़ने की सी चेष्टा करता है । जिससे घाव अधिक बढ़ जाता है । वैसे ही शिष्य अपने मन की शंका गुरु को बताता है तो गुरु बुद्धि-हीन होने से उसे तो दूर नहीं कर सकता किन्तु उसके स्थान में और कई शंकाए खड़ी कर देता है । अत: ऐसा गुरु अयोग्य ही माना जाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “५. गुरु शिष्य निदान निर्णय का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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