बुधवार, 11 मार्च 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६१/६४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६१/६४*
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*रज्जब बिक्त१ रूप गुरु बहु मिलै, शिष चखि२ वोत३ न कोय ।*
*एकै सद्गुरु सूर सम, तिमिर हरै त्रयलोय ॥६१॥*
रात्रि में जुगनू१ बहुत दिखाई देते हैं किन्तु उनसे अंधकार नाश होकर नेत्रों२ को स्पष्ट वस्तु दर्शन का आनन्द३ नहीं मिलता, एक सूर्य के उदय होने से ही त्रिलोक का अंधकार नष्ट होकर स्पष्ट भासने का आनन्द प्राप्त होता है । वैसे ही गुरु तो बहुत मिलते हैं, किन्तु उनसे शिष्यों का अज्ञान नाश द्वारा आनन्द नहीं मिलता । वह तो सद्गुरु प्राप्त होने पर ही मिलता है ।
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*गुरु अनन्त शिष हूँ घणे, पै सद्गुरु भेटैं भाग ।*
*रज्जब रागी बहु मिलैं, पै विरलहु दीपक जाग ॥६२॥*
६२ में सद्गुरु भाग्य से ही मिलते हैं, यह कहते हैं - गायक तो बहुत ही मिलते हैं किन्तु दीपक राग गान से दीपक किसी विरले से ही जगता है वैसे ही गुरु भी बहुत मिलते हैं, शिष्य भी बहुत है किन्तु शिष्य के हृदय में ज्ञान दीपक जगाने वाला कोई विरला ही सद्गुरु होता है और वह किसी भाग्यशाली शिष्य को ही भाग्यवश मिलता है ।
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*बहुते स्वामी शैल१ सुत२, के३ पारस गुरु जान ।*
*रज्जब पलटे लोह शिष, तिनका होय बखान ॥६३॥*
६३ में अयोग्य और योग्य गुरु का परिचय दे रहे हैं - बहुत से गुरु रूप स्वामी तो पर्वत के पत्थर के समान हैं, जैसे पर्वत१ के पत्थर२ लोह नहीं बदलता, वैसे ही उनसे शिष्य नहीं बदलता, किन्तु कोई३ विरला ही सद्गुरु पारस के समान होता है, पारस से लोह सुवर्ण हो जाता है, वैसे ही सद्गुरु से ज्ञान द्वारा शिष्य का हृदय बदल जाता है, भेद से अभेद में आजाता है । जो उक्त रीति से शिष्य को बदल देते हैं, उन्हीं का यश-गान किया जाता है ।
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*वैद्य व्यथा में आप ही, रोगी चीन्हैं नाँहिं ।*
*रज्जब दोन्यों दृष्टि बिन, पचन भये गल१ माँहिं ॥६४॥*
६४-६५ में अयोग्य गुरु शिष्य का परिचय दे रहे हैं - वैद्य स्वयं भी रोगी हो और रोगी भी यह नहीं जान सके कि वैद्य भी रोगी है, तब दोनों ही रोगाग्नि से संतप्त होकर नष्ट होते हैं । वैसे ही गुरु भी अज्ञानी हो और शिष्य भी न जान सके कि गुरु भी अज्ञानी है तब दोनों ही ज्ञान दृष्टि बिना भावग्नि से पक कर संसार दशा में ही नष्ट१ होते हैं ।
(क्रमशः)

 

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