🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना ।*
*पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥३॥*
*हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहीं ।*
*दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥४॥*
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*साँच ॥*
त्राहि त्रिष्ना तऊ न भागी, बूढा हुवा घणेरी लागी ॥टेक॥
नैंन नीर श्रवणाँ नहिं सुणिये, देही काँपै आव घटी ।
नाड़ी डग डग डोलण लागी, मन की कामना तउ न मिटी ॥
असी बरस कौ औषदि मांगै, बैद मिलै कोइ आणौं रे ।
खाट पड्यौ ही खुरदा बरजै, जे खरच्या तौ थे जाणौं रे ॥
साधू संगति कदे न बैठा, स्वारथ लागै कर्म किया ।
राम नाम कौ मरम न जाण्यौं, किहीं पुरातनि पाप लिया ॥
तरणापै तरणी बुधि आई, बालपणैं बुधि बाली ।
बूढा हुवा बुढावलि लागी, सक्यौ न राम सँभाली ॥
हावड़ि धावड़ि कदे न चूकी, जदि कौ कलि में जनम लियौ ।
बषनां हरि कौ नाँव न जान्यौं, जातौ सगली मेल्हि गयौ ॥६६॥
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त्राहि = हाय ! इतना सब कुछ प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी तृष्णा निश्शेष नहीं हुई, उल्टे वृद्धावस्था आने पर और अधिक बढ़ गई है । आंखों में जल आने लगा है, कानों से सुना नहीं जाता है, देह अत्यन्त कृश हो जाने से काँपने लगी है तथा आयु क्षीण हो गई है । नाड़ = गर्दन हिलने लगी है । फिर भी मन की कामना मिटी नहीं है । शरीर सर्वथा जर्जरीभूत हो गया है किन्तु मन अब भी युवा है तथा नाना कामनाओं को पूरा करना चाहता है ।
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अस्सी वर्ष का बुढ्ढा अस्वस्थ होने पर स्वस्थ होने के लिये औषधि मांगता है और कहता है कि कोई अच्छा सा वैद्य मिलता हो तो उसे बुला लाओ ताकि वह सही निदान करके उपयुक्त औषधि देकर मुझे पूर्णरूप से स्वस्थ कर दे । मरणासन्न अस्सी वर्ष के वृद्ध की धन में अब भी इतनी ममता है कि वह चारपाई पर पड़ा-पडा भी छोटे से छोटे खर्चे को करने से भी रोकता है तथा कठोरतापूर्वक परिवारजनों से कहता है कि यदि तुमने जरा भी धन व्यय किया तो फिर जानते ही हो, मेरे से बुरा और कोई नहीं होगा ।
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धन का लालची साधुओं की संगति में सत्संग सुनने को कभी भी नहीं बैठा । बस स्वयं की उदरपूर्ति हेतु ही नाना कर्मों को करने में लगा रहा । सत्संग में बैठकर राम नाम जप के मर्म = महत्त्व तथा उसकी साधना की विधि को किन्हीं पुराने पापों के कारण जाना ही नहीं ।
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तरुणावस्था में तरुणी को भोगने की बुद्धि, बालकपन में बाली = कच्ची = खेलने-कूदने की बुद्धि तथा बृद्धावस्था में बुढावलि = बकवाद =अनावश्यक बोलने की बुद्धि बनी रहने से कभी भी रामजी का स्मरण नहीं कर सका । हावड़ि = धावड़ि = हाय-हाय तबही से चूकी = समाप्त नहीं हुई जब से इस कलिकाल में जन्म लिया है ।
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बषनांजी कहते हैं, मूर्ख संसारी मनुष्य ने घर-धन्धे में उलझकर रामजी के नाम का स्मरण कभी भी नहीं किया और जिस धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा, घर-परिवार के लिये सारी उम्र प्रयत्न करता रहा उसे मरते समय यहीं संसार में ही छोड़ गया, साथ में एक तिनका भी लेकर नहीं गया ॥६६॥

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