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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २१/२४*
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*सतगुरु सीगणि१ हाथ ले, मारे मर्म२ विचार ।*
*जन रज्जब जाके बणैं, सो बैठे तन हार ॥२१॥*
सद्गुरु अपने अन्त:करण रूप हाथ में जीव के कल्याण की भावना रूप धनुष१ लेकर तथा शिष्य-हृदय के दोष-विनाशक-रहस्य२ का विचार करके अर्थात कौन दोष है और किस बाण से नष्ट होगा, ऐसा विचार करके वचन-बाण मारते हैं । बाणघात से जिन शिष्यों के कार्य ठीक बन जाते हैं, वे तो शरीराध्यास को खोकर स्व स्वरूप में स्थित हो जाते हैं ।
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*ज्ञान खङ्ग गुरु देव गहि, दे सेवक शिर आन ।*
*मारत ही मोहन मिले, जे ओडे१ जिव जान ॥२२॥*
गुरुदेव ज्ञान-रूप तलवार को शास्त्रागार से उठाकर लाते हैं और शिष्य के जीवत्व अभिमान रूप शिर पर मारते हैं । यदि शिष्य अपने हृदय में कल्याण-प्रद जानकर उसे झेल१ लेता है, तो मारते ही अर्थात अभिमान के नष्ट होते ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ।
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*सद्गुरु साँग१ सु शब्द की, रसन हाथ ले देय ।*
*जन रज्जब जगपति मिलै, जे उर श्रवण सु लेय ॥२३॥*
सद्गुरु, ज्ञान युक्त सुन्दर शब्द रूप भाला१ जिह्वा रूप हाथ में लेकर मारते हैं, यदि कोई भली प्रकार श्रवणों द्वारा उसे हृदय में धारण करता है, उसे परब्रह्म मिलते हैं ।
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*ज्ञान गुर्ज१ गुरुदेव गहि, गर्द२ किया रण माँहिं ।*
*जो रज्जब सन्मुख गया, सो फिर आवे नाँहिं ॥२४॥*
गुरुदेव ने ज्ञान रूप गदा१ हृदय-हाथ में ग्रहण करके योग-संग्राम में कामादि शत्रुओं को घूली२ में मिला दिया है अर्थात नष्ट कर दिया है । ऐसे गुरुदेव के सन्मुख जो भी गया है अर्थात उनका ज्ञान धरण किया है, वह फिर जन्मादि संसार में नहीं आता है ।
(क्रमशः)

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