🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*निश्चय ॥*
अैसा रे कोई नगर बतावै । यहु संसार जहाँ थैं आवै ॥टेक॥
आवै अलेख लेखै चालै, बाट बहै दिन राती ।
जिहि नगरी जाइ बासा लीणाँ, सो नगरी लखीं न जाती ॥
खलक सवाई जाइ जाइ आई, तहाँ जाणौं भी कहिये ।
अजूँ नौंध नहीं नगरी का, देखि तमासै रहिये ॥
बूझत बूझत वै भीं बूझे, जे बेद कतेब बखाणैं ।
उन्हौं भी कह्या नहीं रे भाई, मैं जाण्याँ ए जाणैं ॥
अबही थैं ठाई करि राखौं, या मनि आई मेरै ।
बषनां बास बसन के ताँई, हरि नगरी कौन हेरै ॥७३॥
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बषनांजी उस नगर, स्थान, स्त्रोत की चर्चा इस पद में वे करते हैं जहाँ से इस संसार तथा संसार में निवास करने वाले जीवों का उद्गम होता है । वे सभी लोगों के अनभिज्ञ होने के कारण इस निर्णय पर पहुँचते है कि मुझे उस स्थान की पहचान शरीर छोड़ने के पूर्व ही कर लेनी चाहिये जिसस्थान में हरि = परात्पर-परब्रहम-परमात्मा निवास करता है ।
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वस्तुतः इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा किसी के स्थान पर न बसकर जर्रे जर्रे में बसता है । अतः बषनांजी उस रास्ते की खोज में है जिस पर चलकर वे ब्रह्म को जानकर ब्रह्म रूप हो सकें । यहां नगरी का तात्पर्य परब्रह्म-परमात्मा से है । वही जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण है उसी से जगत की उत्पत्ति होती है ।
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कोई मुझे ऐसा नगर, स्थान, स्त्रोत बता दे जहाँ से इस संसार का(जड़तत्व) तथा संसार में रहने वाले जीवों का(चित तत्त्व) उद्गम होता है । अनेक(अलेख = अलेख्य) जीव इस संसार में जन्मते हैं । जन्मकर निवास करते हैं और अंत में लेखै = निश्चित क्रमानुसार, निश्चित अवधि पूरी करके इस संसार से चले जाते हैं ।
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आने-जाने का यह क्रम दिनरात, अनवरत चलता रहता है । मरने वाले जिस नगरी में जाकर विश्राम करते हैं वह नगरी देखने में नहीं आती क्योंकि वह भूमण्डल पर नहीं है । समस्त खलक = संसार के जीव उस नगरी में जाते हैं, अपने पाप-पुण्यों को भुगतते हैं और वहाँ से पुनः वापिस भी आते हैं । आने के उपरान्त वे यहाँ अचल रूप में नहीं रह पाते । अतः वे आकर पुनः जाने की बात भी कहते हैं ।
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दिन-प्रतिदिन न जाने उस नगरी से कितने जीव आते हैं और उसमें कितने ही जीव जाते हैं तब भी उस नगरी की असली जानकारी(नौंध) किसी को नहीं हुई है । इसकारण इस विषय में इन आने-जाने वाले लोगों के भोलेपन का तमाशा देख सुनकर चुप रह जाना पड़ता है । जब जिज्ञासावश उस नगरी(परब्रह्म-परमात्मा) के बारे में उनसे पूछा जाता है जो वेद तथा कुरान का पठन-पाठन, चिंतन-व्याख्यान करते हैं तो वे भी उसके बारे में बताने में असमर्थ तो रह ही जाते हैं उल्टे जिज्ञासु से ही पूछने लग जाते हैं ।
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वे कहते हैं, हे भाई ! हमने उस नगरी को अभी तक उतना ही नहीं जाना जितना दूसरे(आत्मजिज्ञासु) जानते हैं । इस विचित्र स्थिति को देख व जानकर मैं बषनां के मन में यह विचार आया कि मैं अबही से उस नगरी के बारे में सभी कुछ ज्ञातव्यों की जानकारी कर लूँ । अतः मैं बषनां अचल बास बसने के लिये उस नगरी = हरि की नगरी = परमात्मा को जानने का प्रयत्न कर रहा हूँ, परमात्मा को खोज रहा हूँ ॥७३॥

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