🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*गर्वै भाव न ऊपजै, गर्वै भक्ति न होइ ।*
*गर्वै पिव क्यों पाइये, गर्वै करै जनि कोइ ॥*
*गर्वै बहुत विनाश है, गर्वै बहुत विकार ।*
*दादू गर्व न कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥*
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काल ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इनका अर्थ “काल कौ अंग” की साषियों में देखें)
जाकै सूरिज तपै रसोई, पवन अँगना जु बुहारै ।
नौ ग्रह बंध्या पाइ, मींच कूँ कुवै उसारै ॥
बिह जाकै दाँणौं दलै, बंदि बांध्या तेतीस ।
बषनां वै भी काल गिरासिया, जाकै दस माथा भुज बीस ॥
जाकै जल था जंघ सवाँणाँ । सागर मथिया करि मेर मथाणाँ ॥
हाथाँ धरि धरि पर्वत ल्याये । बषनां काल उसे नर खाये ॥
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पद ॥
मनिखा मान न कीजै, गहिला गर्ब न कीजै ।
पल पल जाइ अवधि दिन आवै, आव घटै दिन छीजै ॥टेक॥
एकै घूँट समँद जिनि सोख्या, हाथौं परबत ल्याये ।
लंका छोडि प्रलंका पहुँचे, ते भी कालहि खाये ॥
धरि चाँपी धरि गई पयालाँ, एक दाढ परि ल्याये ।
जाकी मापी भई एक डग, ते भी अंति बिलाये ॥
लंका सा कोट समद सी खाई, मंदोदरि सी राणी ।
दस मस्तक बीस भुज जाकै, सो मारि किया धुल धाणी ॥
दाणौं देखि दलै बिह बैठी, रावण तणाँ घराँ ।
वाकै माथैं कौणैं लिखिया, वा लिखती औराँ ॥
चंद कलंक समद पणि खारौ, सीता राम बिजोगा ।
ग्रब काहू कौ रहण न पावै, गरव करौ जिनि लोगा ॥
बडाँ बड़ी कौ डोरू बाजै, बेद पुराणाँ साषी ।
क्रिष्नदेव की गोपी लूटी, अरजन सक्यौ न राखी ॥
कैरौं कहाँ कहाँ पँच पांडौं, भारत भिड़ते भाई ।
दिन दोइ चारि आपणी नौबति, केते गये बजाई ॥
सुर नर मुनिजन पीर पैकंबर, चंद सूर पणि गहिये ।
बषनौं कह हरि गर्ब प्रहारी, जाथैं डरता रहिये ॥७९॥
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मानव ! अभिमान मत कर, हे मूर्ख ! गर्व मत कर । तेरे जीवन की निश्चित आयु की अवधि पल-पल क्षीण हो रही है तथा मृत्यु का समय नजदीक आता जा रहा है । आयु दिनों-दिन घट रही है । दिनों पर दिन व्यतीत हो रहे हैं । जिन अगस्त्य ऋषि ने संपूर्ण सागर के जल को एक घूँट के समान पी लिया; जो पवनपुत्र हनुमान लंका को छोड़कर लंका के बाहर से द्रोणगिरि पर्वत को उखाड़कर हाथ में उठा लाये वे भी काल के ग्रास बन गये ।
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जिस हिरण्याक्ष राक्षस के द्वारा पृथिवी को दबाने पर पृथिवी पाताल में चली गई, उसे शूकर शरीरधारी भगवान् एक दाढ पर रखकर ले आये और उसी पृथिवी को जिन वामनावतार भगवान् ने एक ही ढग में माप डाली वे भी अंत में मर गये, अमर नहीं रह सके । जिस रावण के पास लंका सा किला, उस किले की सुरक्षा के लिये समुद्र सी खाई, मंदोदरी जैसी पतिव्रता पत्नी, दस मस्तक और बीस भुजाएँ थीं उसे भी रामजी ने मारकर नेस्तनाबूद कर दिया ।
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जिस रावण के घर में अनाज के एक-एक दाने को देखकर बिधना बैठी-बैठी पीसा करती थी, बताइये उस बिधना के ललाट पर किसने दाना पीसना लिखा था जबकि वह स्वयं ही सबके ललाटों पर जन्म के छटे दिन भाग्य लिखती है ? चंद्रमा के परस्त्रीगमन का कलंक लगा जो आज भी प्रत्यक्ष दीखता है, जल की निधि समद्र का जल खारा हो गया, सीता और राम का वियोग हुआ ।
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अतः हे मनुष्यों ! अपने धन, जन, बल का गर्व मत करो । गर्व किसी का भी रहता नहीं है क्योंकि परमात्मा गर्वप्रहारी है । वह गर्व करने वालों के गर्व को स्थिर नहीं रहने देता है । अनेकों बड़े-बड़े = महान् स्त्री-पुरुषों के गौरव-गान के ढोल बजते रहे हैं जिनकी साक्षी वेद-पुराणादि में सुरक्षित हैं । उनमें कृष्ण और अर्जुन का नाम अन्यतम है । फिर भी उन्हीं कृष्ण की गोपियों को भीलों द्वारा लूट लिया गया और उनकी रक्षा में चल रहा उनके साथ अर्जुन उनकी तनिक सी भी रक्षा नहीं कर सका ।
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आज वे बलशाली कौरव और पांडव कहाँ हैं जिन्होंने महाभारत जैसा युद्ध लड़ा था । अर्थात् वे सभी दो चार दिन अपनी-अपनी नोबत बजाकर = अपना-अपना कार्य करके मर गये । उनमें से कोई भी शेष नहीं बचा । चाहे देवता, मनुष्य, मुनिजन, पीर, पैगंबर, चंद्रमा और सूर्य हों चाहें और कोई हों, किसी के भी गर्व को भगवान् रहने नहीं देता । वह गर्वप्रहारी, गर्वगंजन है । अतः गर्व कभी मत करिये । गर्व करने से बचते रहिये ॥७९॥

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