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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४९/५२
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करै करावै रामजी, सुन्दर सब घट मांहिं ।
ज्यौं दर्पन प्रतिबिंब है, लिपै छिपै कछु नाहिं ॥४९॥
निर्लेपता का उदाहरण : वह सभी शरीरों में रहता हुआ प्रभु निरञ्जन निराकार राम ही सभी प्राणियों की क्रियाओं का सञ्चालक होता है३ । इतने पर भी, इसकी स्थिति वही होती है; जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब की । अर्थात् जैसे दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब का कीचड़(कर्दम) आदि दर्पण में लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार प्राणी के शुभाशुभ कर्मों से वह निरञ्जन निराकार भी लिप्त नहीं होता ॥४९॥ (३ तु० - श्रीमद्भगवद्गीता : भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ अ० १८, श्लो० ६१.)
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बाजीगर बाजी रची, ताकौ आदि न अंत ।
भिन्न भिन्न सब देखिये, सुन्दर रूप अनंत ॥५०॥
दूसरा उदाहरण : जैसे किसी बाजीगर द्वारा दिखायी जा रही कला(बाजीगरी) का कोई आदि या अन्त नहीं होता; उसी प्रकार, इस प्रभु की रची हुई सृष्टि के अनेक रूपों को देखते रहिये, इन का आदि या अन्त खोजने का प्रयास न कीजिये ॥५०॥
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काढि काढि बाहिर करै, राते पीरे रंग ।
सुन्दर चांवर धूरि के, पंख परेवा संग ॥५१॥
वह बाजीगर अपने झोले में से निकालकर लाल या पीले आदि रंग की अनेक वस्तु दिखाता है । वह धूलि के कणों(चांवलों) से पंख वाले कबूतर उड़ा सकता है ॥५१॥
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कबहुँ मिलावै गोटिका, कबहूं बीछुरि जांहिं ।
सुन्दर नाचै जगत सब, ऐसी कल तुझ मांहिं ॥५२॥
कभी वह दो पुतलियों को मिला देता है, कभी पृथक करता हुआ उनको नचाता है; इसी प्रकार आप प्रभु भी इस समस्त जगत् को नचाते रहते हैं । ऐसी अलौकिक कला(बाजीगरी) आप के पास है ॥५२॥
(क्रमशः)

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