रविवार, 22 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४
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सांई तेरी अगम गति, हिकमति की कुरबांन । 
सब सिरजै न्यारा रहै, सुन्दर यह हैरान ॥४१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे स्वामिन् ! आप के बुद्धिमत्ता(हिकमत) एवं चतुरता युक्त कर्म किसी के लिये भी समझ से बाहर हैं, अतः मैं आप की बलिहारी जाता हूँ कि आप इतनी विशाल सृष्टि की रचना कर के भी इस से पृथक् ही हैं । यह देखकर मैं आश्चर्यचकित(हैरान) हूँ ॥४१॥ 
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शेख मसाइक औलिया, सिध साधिक मुख मौंन ।
वै भी बैठे थाकि करि, सुन्दर बपुरा कौंन ॥४२॥ 
वास्तविकता यह है कि शेख, मसाइक, औलिया आदि मुस्लिम साधक सन्त एवं सिद्ध साधक आदि आर्यमतानुयायी सन्त ही जब आप के यथार्थ वर्णन में थक कर मौन रहते आ रहे हैं तो मुझ अकिञ्चन सुन्दरदास की कौन गणना है ! ॥४२॥
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प्रीतम मेरा एक तूं, सुन्दर और न कोइ । 
गुप्त भया किस कारनै, काहि न परगट होइ ॥४३॥
इन ही सब कारणों से अब मैं केवल आपको अपना प्रियतम(इष्टदेव) मानता हूँ, अन्य किसी(देवता) को नहीं । इतना होने पर भी आप मुझ से क्यों छिपे बैठे हैं, मेरे सम्मुख आप प्रकट क्यों नहीं होते ! (मुझको दर्शन क्यों नहीं देते!) ॥४३॥
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धन्य धन्य मोटा धनी, रच्या सकल ब्रह्मंड । 
सुन्दर अद्भुत देषिये, सप्त दीप नौ खंड ॥४४॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे मेरे सर्वशक्तिमान् स्वामी ! आपने यह बहुत ही आश्चर्यमय सकल ब्रह्माण्ड बनाया है कि जिसमें अद्भुत सात द्वीप एवं नौ खण्ड पृथक् पृथक दिखायी दे रहे हैं ॥४४॥
(क्रमशः) 

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