शनिवार, 28 मार्च 2026

‘‘करामात कलंक है’’

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
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आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें  जिन २ आचार्यों का जो२ वृत्तान्त मुझे प्राप्त हो सका है, वह मैंने इस आचार्य पर्व में अंकित कर दिया है । किन्तु कुछ आचार्य प्रणाली में न आने वालों के नाम भी कुछ ग्रंथों में आचार्य गद्दी पर समाज की इच्छा के बिना भी कुछ कुछ ने अपना अधिकार रक्खा है । अत: उनका परिचय देना भी उचित समझकर अब उनका परिचय दिया जाता है-  
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१- गरीबदासजी महाराज ने रज्जबजी द्वारा कहे हुये अपने भेंट के सवैया ‘दादू के पाट दिपे दिन दिन ही’ में मारक गणों का प्रयोग देखकर समझ लिया कि मेरा शरीर अब अधिक दिन नहीं रहेगा । अत: मुझे अब शीघ्र ही गद्दी छोड देनी चाहिये । फिर उन्होंने अपने निश्‍चय के अनुसार वि. सं. १६९२ मार्गशीर्ष शुक्ला १३ को गद्दी छोड दी और भैराणे जाकर भजन करने लगे । 
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कुछ जन श्रुति ऐसी भी सुनने में आई है कि वे नारायणा दादूधाम से दक्षिण की और मालपुर, जूनिया, होडोलाई की ओर पधार गये थे । किन्तु दौलतराम जी ने महन्त लीला प्रकरण में भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख किया है । हो सकता है भैराणे से उक्त ग्रामों के भक्त उनको ले गये हों । गद्दी छोडने के समय गरीबदासजी के मुख्य शिष्य केवलरामजी नारायणा दादूधाम में नहीं थे । बीजराणा के सेवकों के साथ गये हुये थे । 
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आगे जब उन्हें ज्ञात हुआ कि महाराज यहाँ नहीं हैं, सदा के लिए गद्दी का त्याग करके पधार गये । तब केवलराम जी उक्त ग्रामों की ओर जाकर गुरुदेव जी की सेवा में उपस्थित हुये । उधर कुछ बणजारे भक्तों को गरीबदासजी का सत्संग प्राप्त होने से वे गरीबदासजी के भक्त बन गये और सेवा करने लगे । और उधर ही आप वि. सं. १६९३ पौष कृष्णा १३ बृहस्पतिवार को ब्रह्मलीन हुये । 
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फिर केवलरामजी उनके शरीर को लेकर भैराणे आये । ऐसी जन श्रुति कनिरामजी स्वामी नारायणा ने सुनाई है किन्तु किसी भी ग्रंथ में यह विवरण मुझे नहीं मिला है । भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख मिला है । फिर केवलराम जी भैराणे से नारायणा दादूधाम में आये । गद्दी पर तो कोई था ही नहीं अत: अपने आप ही केवलराम जी गद्दी पर बैठ गये । 
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इस समय सभाकुमारी जी ने भी इनको गद्दी पर बैठने से नहीं रोका । कारण- ये गरीबदासजी के मुख्य शिष्य थे ही । फिर जब अजमेर के एक कायस्थ सज्जन सूबा अजमेर के भय से भाग कर केवलराम जी की शरण आये और उनको पकडने कुछ सैनिक आये । उनसे उक्त कायस्थ सज्जन की रक्षा के समय आपके विलक्षण चमत्कार से कई सैनिकों के प्राण गये । 
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उस घटना को सुनकर तत्कालीन किशनगढ नरेश केवलरामजी महाराज के दर्शन करने आये और अजमेर के कायस्थ सज्जन जो अब केवलरामजी के शिष्य होकर ‘रामदास’ बन गये थे, उनका प्रसंग चलने पर किशनगढ नरेश ने हाथ जोडकर केवलरामजी को कहा- स्वामिन् ! दादूजी महाराज ने कहा है- ‘‘करामात कलंक है’’ किन्तु आपने दादूजी के कथन को न मानकर अपनी करामात से कई मानवों के प्राणान्त करवा ही दिये । 
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दूसरे आप समाज की इच्छा न होने पर भी गद्दी पर अपनी शक्ति के बल पर ही तो विराजे हुये है । आप जैसे समर्थ संतों को यह व्यवहार शोभा नहीं देता है । आपका विरोध भी कौन कर सकता है । आपको ही सोचना चाहिये । जिससे समाज में एकता बनी रहे ऐसा ही व्यवहार आपको करना चाहिये । किशनगढ नरेश उक्त प्रार्थना करके चले गये ।  
(क्रमशः)

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