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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग ९/१२
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सुन्दर याकै ऊपजै, काम क्रोध अरु मोह ।
याही कै ह्वै मित्रता, याही कै ह्वै द्रोह ॥९॥
अतः श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन उपर्युक्त तीन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि काम, क्रोध, और मोह, मित्रता एवं वैर(द्रोह) पुरुष अपने मन में ही उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी से इसका कोई लेना - देना नहीं है । विद्वानों का भी कहना है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥९॥
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आपु हि फेरी लेत है, फिरते दीसै आंन ।
सुन्दर ऐसै जानि तूं, तेरौ ही अज्ञांन ॥१०॥
जैसे भ्रमिचक्र(हिंडोला) में बैठा हुआ पुरुष स्वयं घूमता है; परन्तु उस को दूसरे लोग घूमते हुए प्रतीत होते हैं; ऐसे ही जिज्ञासु को जानना चाहिये कि उस को दूसरे में दिखायी देने वाले राग द्वेष आदि के भाव उस के अपने हृदय के अज्ञान की ही उपज हैं ॥१०॥
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सुन्दर याकै संक ह्वै, याही ह्वै निहसंक ।
याही सुधौ ह्वै चलै, याही पकरै बंक ॥११॥
पुरुष को अपने ही मन में विविध शङ्काएँ उद्भूत होती हैं तथा उन के उत्तर भी उसी मन से मिलते हैं । उसका अपना मन कभी सीधा(सात्त्विक भाव से) चलता है या कभी वही मन बांकापन(द्वेष भाव) ग्रहण कर लेता है ॥११॥
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सुन्दर याकै अज्ञता, याही करै बिचार ।
याही बूडै धार मैं, याही उतरै पार ॥१२॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पुरुष के ही मन में अज्ञता(अज्ञान या मूर्खता) उद्भूत होती है तो कभी यही मन विचार(विवेक) पूर्वक ज्ञान का व्यवहार करने लगता है । यही कभी अपने विचारों से प्रबल जलधारा(गम्भीर सङ्कट) में डूबने लगता है तो कभी यही स्वयं अपने विचारों से उसके पार पहुँच जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

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