बुधवार, 25 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१
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वचन तहां पहुंचै नहीं, तहां न ज्ञान न ध्यांन । 
कहत कहत यौं ही कह्यौ, सुन्दर है हैरांन ॥५७॥
आपके यथातथ वर्णन करने में न किसी की वाणी समर्थ है और न उसकी ज्ञानमय एवं ध्यानमय गम्भीर साधना ही । आपके विषय में शास्त्रों में भी जो कुछ कहा गया है वह भी पूर्ण नहीं है । आपका यह भक्त सुन्दरदास इसी से चकित(हैरान) है ! ॥५७॥
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नेति नेति कहि थकि रहे, सुन्दर चार्यौं बेद । 
अगह अकह अविशेष कौं, कोउ न पावै भेद ॥५८॥
बहुत साहस कर आपका वर्णन करना चाहने वाले समर्थ विद्वान् कुछ न्यूनाधिक कह कर अन्त में आप को 'नेति नेति'(अनिर्वचनीय = अवर्णनीय) कह कर मौन हो गये । वेद शास्त्र भी आप असाधारण को किसी भी प्रकार 'न जानने योग्य', 'न ग्रहण करने(समझने योग्य)’ कहकर चुप हैं । कहने का अभिप्राय यही है कि आप का वास्तविक भेद(ज्ञान) कोई भी नहीं जान पाया ॥५८॥
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किनहूं अंत न पाइयौ, अब पावै कहि कौंन । 
सुन्दर आगें होहिंगे, थाकि रहे करि गौंन ॥५९॥
इस प्रकार कोई भी शास्त्र या विद्वान् आज तक आप को 'इदमित्थम्'(आप यह हैं या ऐसे हैं) कर के नहीं पहचान सका । आगामी काल में भी आप को कोई यथातथ रूप से पहचान सकेगा - यह भी सम्भव नहीं दीखता । अतः हम भी थक कर इस विषय को यहाँ छोड़‌कर आगे बढ़ते हैं१ ॥५९॥ 
(१ तु० श्रीमद्भगवद्‌गीता : अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
अकोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। अ० २, श्लोक २४, २५.
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लौंन पूतरी उदधि मैं, थाह लेन कौं जाइ । 
सुन्दर थाह न पाइये, बिचि ही गई बिलाइ ॥६०॥
आप के विषय में पूर्ण ज्ञान करना तो ऐसा ही है जैसे कोई नमक की पुतली(मूर्ति) समुद्र की गहराई जानने के लिये उसमें फैंकी जाय । वह उसकी गहराई का पार तो क्या पायगी, अपितु वह स्वयं पिघल कर तद्रूप हो जायगी । यही स्थिति मेरे जैसे आपके सभी साधकों की हुई है ॥६०॥
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अनल पंखि आकाश मैं, उडै बहुत करि जोरि । 
सुन्दर वा आकास कौ, कहूं न पायौ छोर ॥६१॥
इति समर्थाई को अंग ॥२१॥
यहाँ श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण भी देते हैं - जैसे कोई अनलपक्षी जीवनपर्यन्त अपनी पूर्ण शक्ति तथा वेग से आकाश में उड़ता रहता है तो भी वह उस आकाश का आदि(आरम्भ) या अन्त(समापन भाग) नहीं बता सकता; क्योंकि क्या कभी किसी ने उस आकाश के आदि या अन्त के किनारे का ज्ञान प्राप्त किया है ! ॥६१॥
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इति समर्थाई आश्चर्य का अंग सम्पन्न ॥२१॥
(क्रमशः) 

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