🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।*
*मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥*
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*परिचय ॥*
तहाँ भरै माली एक पाली, सहज सींचै बेलि रे ।
बांध्यौ चड़स आवै, त्रिबेणी चढ़ि झेलि रे ॥टेक॥
नीर निरमल सिर सीतल, सहज कील्यौ सांधि रे ।
गगनि कूवा धरणिबाड़ी, ध्यान धोरा बांधि रे ॥
भोमि भीनीं बाह दीनीं, कमाई करि खाँति रे ।
पंच संगी सहजि लागे, नीपनी बहु भाँति रे ॥
गुरि बीज बाह्यौ ऊगि आयौ, बिरख बधतौ जाइ रे ।
तिहि बिरखि फल अमर लागौ, सो फल सूवौ खाइ रे ॥
रंगि रातौ रहै मातौ, भँवर बाड़ी मैं रमैं ।
फूल नाहीं बास आवै, मंन मधुकर जहाँ रमैं ॥
अमर फलियाँ हुई रलियाँ, पूगी मनह जगीस रे ।
रमैं बषनौं राम सेती, तहाँ बिसवावीस रे ॥८१॥
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माली = गुरु । पाली = क्यारी = चित्तवृति, हृदय । सीचैं बेलि = गुरूपदेशानुसार साधना करे । चित्त बांध्यौ = चित्त रूपी चड़स को लय रूपी रस्सी से बांधकर साधना रूपी कूवे में डुबोकर पुनः राम-नाम रूपी जल के साथ बाहर निकाले । सीर = स्त्रोत । कील्यौ = कीली, चड़स के पास चड़स को खींचने वाली रस्सी में लगी रहती है और जो चड़स को रोकने का काम करती है ।
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कूवा = सुषुम्ना का जल ऊपर से नीचे की ओर आता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फवारा । सून्य सिषर का यह व्यवहारा ॥” (श्रीरामचरणजी की वाणी) धरणि = हृदय, योग ग्रंथों के अनुसार मूलाधारचक्र जहाँ कुंडलिनी रहती है । धोरा = जिसमें होकर जल प्रवाहित होता है, नाली । भीनीं = भीग गई । बाह = बीज बो दिया ।
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खाँति = प्रेम के साथ, उत्साह-उमंग के साथ । पंचसंगी = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । नीपनी = खेती अच्छी उपजी, साधना निर्विघ्न पूर्ण हो गई । जगीस = जिजिविषा = मुमुक्षु । जहाँ माली रूपी सद्गुरु आत्मजिज्ञासु के पाली = क्यारी रूपी हृदय को जल रूपी उपदेश से भर देता है और आत्मजिज्ञासु सहजभाव से बेलि = वृक्ष रूपी साधना को सहज रूप में = जिस विधि से गुरु ने साधना करनी बताई है, उसी विधि से सींचै = करता है ।
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चित्त रूपी चड़स(कूवे में से पानी निकालने का पात्र जो चमड़े का बना होता है) को लै रूपी रस्सी से बांधकर निकालता है तथा त्रिवेणी(इड़ा-पिंगला तथा सुषुम्ना का मिलन स्थल, भ्रूमध्यस्थ) रूपी ढाणें = (कूवे का ऊपरी भाग जहाँ खड़े होकर चड़स को कूवे में उतारा व निकाला जाकर पानी में डाला जाता है । फिर वहीँ से पानी धोरों में होकर क्यारियों में जाता है) पर खड़े होकर लय = वृत्ति को झेलता = पकड़ता है ।
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वहाँ रामजी की प्रेममयी भक्ति रूपी शीतल = अजस्त्रस्त्रोत युक्त निर्मल नीर प्राप्त होता है । उसे सहज रूपी कील से रोक लेना चाहिये । कूप में बापिस नहीं जाने देना चाहिये । ब्रह्मरंध्र रूपी कूप, हृदय रूपी बाड़ी तथा ध्यान रूपी धोरे को भली प्रकार बना लेना चाहिये जिससे हृदय रूपी भूमि सिंचित हो जायेगी । फिर उसमें भक्ति रूपी बीज बो देना चाहिये और उस भक्ति को उत्साह के साथ प्रेमपूर्वक करनी चाहिये ।
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साधना में पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ सहज ही सहयोग करने लगेंगी जिससे साधना रूपी खेती अच्छी मात्रा में उत्पन्न होगी । साधना अच्छी तरह परिपक्व होगी । गुरुमहाराज का उपदेश रूपी बीज = राम नाम जो उन्होंने प्रदान किया था को बो देने पर वह उग आया और साधना रूपी वृक्ष दिनानुदिन बढ़ता ही जाता है ।
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उस साधना रूपी वृक्ष के अमर = स्वात्मानंद रूपी फल लगता है जिसे जीव रूपी तोता खाता = भोगता है । वह जीव रूपी तोता स्वात्मानंद रूपी फल में ही रत है, उसी में मस्त रहता है । उस बाड़ी रूपी परमानंद = आत्मानंद रूपी बाड़ी में जीव रूपी भँवरा रसास्वादन करता हुआ रमता है । उस बाड़ी में न फूल रूपी विषयसुख है और न उनकी चाहना रूपी गंध है ।
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वहाँ आत्मानंद रूपी फल ही फल है जहाँ मन रूपी भँवरा सदैव मंडराता रहता है । अमर फल रूपी आत्मानंद के प्राप्त होते ही रलियाँ = आनंद ही आनंद रूपी सम्मिलन होता है । वस्तुतः अनेकों जन्मों की परमानंद को प्राप्त करने की जगीस = इच्छा पूर्ण हो गई । बषनां बिसवाबीस = पूर्णरूप से ऐसे अखंडानंद स्वरूप राम में रमण करता है ॥८१॥

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