सोमवार, 16 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४
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जाकी आज्ञा मैं रहै, सुन्दर सप्त समुंद्र । 
सबही मांनहिं त्रास कौं, देवन सहित पुरंद्र ॥२१॥ 
अधिक क्या कहें, संसार के सातों समुद्र भी इन प्रभु के वशवर्ती(आज्ञाकारी) हैं । सभी देवता तथा उनके स्वामी इन्द्र भी उन प्रभु का भय एवं सङ्कोच मानते हैं ॥२१॥
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जाकी आज्ञा मैं रहै, ब्रह्मा विष्णु महेस । 
सुन्दर अवनि अनादि की, धारि रहे सिर सेस ॥२२॥
देवताओं में श्रेष्ठ तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इन निरञ्जन निराकार प्रभु की आज्ञा के पालन में अपना गौरव समझते हैं । यदि पुराण शास्त्र की बात मानी जाय तो सहस्रमुख शेषनाग अनादि काल से प्रभु का आदेश मान कर इस समस्त पृथ्वी का भार अपने शिर पर ढो रहे हैं ॥२२॥

सुन्दर आज्ञा मैं रहै, काल कर्म जमदूत । 
गण गंधर्व निशाचरा, और जहां लगि भूत ॥२३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जगत् के सञ्चालक काल एवं कर्म तथा यमराज(धर्मराज) देव, गन्धर्वगण, रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस, भूत एवं प्रेत भी इनकी आज्ञा में रहना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं ॥२३॥
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सिध साधिक जोगी जती, नाइ रहे मुनि सीस । 
सुन्दर सब ही कहत हैं, जै जै जै जगदीस ॥२४॥
तीनों लोकों में प्रसिद्ध सिद्ध(ज्ञानी), योगी, यति, ऋषि एवं मुनि भी इन प्रभु का जगदीश्वर के रूप में गौरव मानते हुए इनका सदा जय-जयकार ही करते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः)

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