सोमवार, 16 मार्च 2026

*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥२५॥*
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*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१* 
(१ इस साषी का अर्थ ‘बेसास कौ अंग’ में देखें ।) 
मात पिता का गमि नहीं, तहाँ पिवाया खीर ।
सो गुण थारा रामजी, बषनैं लिख्या सरीर ॥
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पद ॥
हूँ क्यूँ बीसरौं रे, तो गुण दीनदयाल ।   
तूँ म्हारौ औगुण छाँवणौं करणा मैं किरपाल ॥टेक॥
जिहिं उदर माँहिं अधार दियौ, नीर खीर सँजोइ ।
सो थारा किया रामजी, म्हारै कहैं न होइ ॥
जिहिं सिरज्या जल बूंद थैं, बांध्या इस्या बँधाण ।
सोह मनैं क्यूँ बीसरै, जिहिं का ये सहिनाण ॥   
जिहिं सागै ए सहि सगा, मात पिता परिवार ।
जिहिं तूटाँ सहि तूटिसें, कोइ राखै नँहीं लगार ॥
और सबै बीसारस्यौं, कहुँ नहिं म्हारै भाइ ।
जिहिं बिना म्हारै ना सरै, सो क्यूँ बीसार्यौ जाइ ॥
ए गुण थारा रामजी, ए दूजा का नाहिं ।
सो बषनौं क्यूँ बीसरै, म्हारै लिख्या जु हिरदै माहिं ॥७२॥
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हे दीनों पर दया करने वाले दीनदयालु परमात्मन् ! मैं आपके अनंतानंत गुण = उपकारों को क्योंकर विस्मृत करूं क्योंकि आप अकारण ही कृपा करने वाले करुणामय तथा मेरे अवगुणों को छावणौं आच्छादित = ढँकने = विस्मृत कर देने वाले हैं । 
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पदकार परमात्मा के अमित उपकारों में से कुछ का दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं, आपने माता के उदर में जल और खीर = दूध = भोजन की व्यवस्था करके मुझे अधार = जगत् में आने के लिये सुदृढ़ आधार रूपी शरीर प्रदान किया । यह सब आपका ही कृत्य है, कोई भी इसे अपना कृत्य नहीं बता सकता । आपने मेरे शरीर का सृजन जल = वीर्य की एक बूंद मात्र से किया और माता के उदर में खाने-पीने का पूरा प्रबन्ध करके इसप्रकार की व्यवस्था की कि मुझे संसार में आने में किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा । 
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जिस परमात्मा के = आपके उक्त प्रकार के सहिनाण = उपकारों के नमूने हैं, वह परमात्मा मुझे क्योंकर भूल सकता है । अर्थात् आपका स्वभाव तो अकारण ही दया-कृपा करना है । अतः मैं चाहे आपको याद करूँ अथवा नहीं करूँ आपतो मुझ पर कृपा करेंगे ही । अतः आपके द्वारा मुझे भूला जाना कैसे भी संभव नहीं है । हे परमात्मन् ! आपका प्रभाव भी अमित है । 
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आपसे सम्बन्ध रहने पर माता, पिता परिवार वाले सभी परिजन भी मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते हैं । इसके विपरीत आपसे सम्बन्ध टूटते ही ये सभी सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं । इनमें से कोई भी लगार = तनिक सा भी प्रेम-सम्बन्ध नहीं रखते हैं । 
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(वेदान्त की दृष्टि से देखें तो ज्ञात होता है, जब तक शरीर का सम्बन्ध चैतन्य से रहता है, तबतक ही सगे सम्बन्ध उससे सम्बन्ध रखते हैं । जैसे ही शरीर से चैतन्य निष्क्रमण करता है वैसे ही सभी परिवारजन मरा-मरा कहकर जलाने को शमशान में ले जाते हैं । अतः पदकार का कहना सर्वथा व्यावहारिक तथ्याधारित है कि असली प्रेम चैतन्य को लेकर ही होता है । फिर क्यों नहीं उसी से एकान्तिकी प्रेम किया जाय । वस्तुतः समष्टिचैतन्य ही ब्रह्म तथा व्यष्टिचैतन्य ही जीव है ।) 
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हे परमात्मन् ! अब मेरा और कहीं भी किसी से भाव = लगाव = राग नहीं रह गया है । फिर भी यदि कहीं किसी से प्रकट, गुप्त रूप में कोई राग-सम्बन्ध है तो उसे भी मैं सर्वथा विस्मृत कर दूंगा । किन्तु जिस परमात्मा के बिना मेरा काम बिलकुल नहीं चल सकता, उस परमात्मा = आपको मैं कैसे विस्मृत कर सकता हूँ । 
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हे रामजी ! उक्त प्रकार के अनिर्वचनीय उपकार आपही कर सकते हैं; दूसरों के द्वारा इस प्रकार के उपकार करना संभव नहीं है । ऐसे उपकारों को मैं बषनां कैसे विस्मृत कर सकता हूँ क्योंकि ये सभी उपकार मेरे हृदय-पटल पर अमिट रूप में अंकित हो चुके हैं ॥७२॥ 

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