सोमवार, 30 मार्च 2026

ध्यानीबाई

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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४- वि. सं. १७५० में आचार्य फकीरदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर आचार्य गद्दी पर बैठने का फिर विवाद चल पडा । कई व्यक्ति गद्दी पर बैठने के लिए तैयार हो रहे थे । सभाकुमारी जी की शिष्या और फकीरदासजी की सहोदरा बहिन ध्यानीबाई जी बहुत उज्चकोटि की संत थी । उसने विवाह नहीं किया था । आजन्म ब्रह्मचारिणी रही थी । 
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सभाकुमारी से उसने दादूजी महाराज की साधन पद्धति जान कर साधन किया था । इससे वह महान् संत बन गई थी । ज्ञान, भक्ति, योग आदि परमार्थिक  साधना में वह संतों से भी आगे बढी हुई थी । उस समय नारायणा दादूधाम के सभी संत ध्यानीबाई की परमार्थिक  योग्यता से अति प्रभावित थे । गद्दी पर बैठने के विवाद की बात ध्यानीबाई को जब ज्ञात हुई तो साधु समुदाय में उसने कहा- ‘संतों कुछ सोच विचारकर बात करो, गादी पर बैठने के लिये ऐसे आतुर हो रहे हो जैसे लोग बताशा प्रसाद लेने को तैयार होकर आगे बढते हैं किन्तु गादी प्रसाद तो नहीं है । मेरे गुरु सभाकुमारी जी ने जैसा किया था इस समय मुझे उनका अनुकरण करना पडेगा । गादी आप महानुभावों में से किसी को भी नहीं मिलेगी । 
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जो गादी के योग्य होगा उसी को गादी पर समाज बैठायेगा । मैं बैठूं , मैं बैठूं करने वालों को बैठना चाहता ही उचित नहीं है । जो बिना अधिकार गादी पर बैठना चाहता हो तो वह समाज को निराशा का उपदेश भी कैसे कर सकता है । कारण- वह तो स्वयं गद्दी की आशा से बन्धा हुआ है । अत: जब तक समाज एक मत होकर योग्य आचार्य को नहीं बैठायेगा तब तक आचार्य का कार्यभार मैं संभाला करुंगी ।
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सभाकुमारी की शिष्या ध्यानीबाई का उक्त भाषण सुनकर सब मौन रहे । गद्दी पर बैठने के लिये किसी भी व्यक्ति ने कुछ भी तो नहीं कहा । कारण- ध्यानीबाई की शक्ति को सब जानते थे और उनसे सब डरते थे । फिर गद्दी का कार्यभार ध्यानीबाई ने संभाल लिया । ध्यानीबाई के समय में एक चारण नारायणा दादूधाम में आया और ध्यानीजी से उसने कुछ मांग की । 
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ध्यानीजी ने उस की मांग पूरी नहीं की, इससे उसने देश भर में यह बात फैलाई कि - ‘‘दादू के सब ही मरे, ध्यानी बैठी पाट ।’’ 
यह उक्ति दूर दूर तक जा पहुँची । पंजाब प्रान्त में दौसा के महन्त सुखरामजी उस समय तीन सौ महात्माओं के साथ भ्रमण करते हुये दादूवाणी के उपदेशों द्वारा जनता को भगवान् के सम्मुख कर रहे थे । उनके पास भी उक्त उक्ति जा पहुँची । उन्होंने जब सुना कि - ‘‘दादू के सब ही मरे, ध्यानी बैठी पाट’’ तब उसी समय पंजाब से नारायणा दादूधाम के लिये प्रस्थान कर दिया । 
(क्रमशः)  

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