सोमवार, 30 मार्च 2026

२२. आपने भाव को अंग १७/१९

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग १७/१९ 
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नीचै तैं नीचै सही, ऊंचै ऊपरि ऊंच । 
सुन्दर पीछै तैं पछै, आगै कौं न पहूंच ॥१७॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज जिज्ञासु को उपदेश देते हैं - हे जिज्ञासु ! इतना सब कहने के बाद तुम समझ गये होगे कि तुम्हारा भला बुरा जीवन तुम्हारे ही चिन्तन पर आधृत है । यदि तुम हीन चिन्तन करोगे तो तुम्हारा जीवन भी हीन होता चला जायगा । यदि तुम उत्तम चिन्तन करोगे तो तुम्हारा जीवन भी उत्कृष्टता की ओर बढ़ेगा । यदि तुम प्रतिकूल चिन्तन करोगे तो तुम पिछडते ही जाओगे, जीवन में आगे नहीं बढ़ सकते । तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति कभी नहीं हो सकती ॥१७॥
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बाहिर भीतरि सारिखौ, ब्यापक ब्रह्म अखंड । 
सुन्दर अपने भाव तें, पूरि रह्यौ ब्रह्मंड ॥१८॥
यदि तुम आध्यात्मिक चिन्तन करोगे तो तुम्हें शीघ्र ही ज्ञात हो जायगा कि यह समस्त जगत्(ब्रह्माण्ड) बाहर भीतर एक सा है, क्योंकि इसमें सर्वत्र निरञ्जन निराकार प्रभु व्याप्त हैं ॥१८॥
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याही देखत सूर सौ, याही देखत चंद । 
सुन्दर जैसी भाव है, तैसौ ई गोबिंद ॥१९॥
जो व्यक्ति सूर्य को सूर्य भाव से देखता है उसको वह सूर्य ही दिखायी देता है, जो चन्द्रमा को चन्द्रमा के भाव से देखता है तो उसे वह चन्द्रमा ही दिखायी देता है; इसी प्रकार जो भक्त निरञ्जन निराकार राम को उस भाव से देखता है उसके सम्मुख वे वे प्रभु उसी रूप में प्रकट होते हैं ॥१९॥
(क्रमशः)

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