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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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२- उनके जाने पर केवलरामजी ने अपनी बुद्धि में विचार किया कि राजा का कथन तो सर्वथा सत्य ही है, मुझे गद्दी तो छोड ही देनी चाहिये । फिर वे गद्दी छोड कर बादशाह जहांगीर ने गरीबदासजी के निवास के लिये जो महल बनाया था उसमें आकर रहने लगे । गद्दी पर बैठता छोड दिया । तब सूनी गद्दी देखकर बीसों साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हो गये और वे परस्पर कहने लगे मेरा अधिकार है मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा । यह होने लगा ।
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केवलराम जी चार वर्ष तक गद्दी पर विराजे थे । कहा भी है-
‘गरीबदास गरीब के शिष्य सु केवलदास ।
चार वर्ष गादी तपे, पूरण प्रेम प्रकाश ॥’ (वासुदेव )
उक्त गादी पर बैठने की गडबड की बात किसी ने सभाकुमारी जी को सुनाई तब सभाकुमारी ने आकर कहा-
‘‘सूनी गादी देखकर सभाकुमारी आय ।
सभाकुमारी बोलिया, सुनियो संत सधीर ।
गादी म्हारा बीर की, तामें म्हारो सीर ॥’’ (दौलतराम)
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सभाकुमारी जी ने कहा- ‘‘धैर्यमान् संतों- मेरी बात सुनो- गद्दी पर तो बैठ सकता है, जिसका अधिकार हो और समाज जिनको बैठाये । अत: किसी का भी गद्दी पर बैठने का अधिकार नहीं है किन्तु मेरे बडे भ्राता गरीबदासजी की गद्दी है । केवलरामजी का अधिकार भी था किन्तु समाज उन्हें नहीं चाहता था । अत: उन्होंने गद्दी त्याग दी ।उनके लिये यह श्लाघनीय बात है किन्तु अब तो जिसको अधिकार होगा और जिसको समाज एकमत होकर बैठायेगा वही बैठेगा । तब तक गादी का संरक्षण मैं स्वयं करुंगी ।’’
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३- सभाकुमारी महान् तपस्विनी गार्गी के समान तत्वनिष्ठ बाल ब्रह्मचारिणी और दादूजी महाराज की शिष्या, गरीबदासजी की सहोदरा बहिन थी । उनका प्रभाव समाज पर अच्छा था । अत: जब तक समाज में एकता नहीं आई तब तक आचार्य का कार्य सभाकुमारी जी ने किया ।
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तीन वर्ष में सब एकमत हो गये और निश्चय किया कि - परम विरक्त दादूजी महाराज के शिष्य और गरीबदासजी के भाई तथा छोटे गुरु भाई मसकीन दासजी ही वास्तव में गद्दी के अधिकारी हैं । उन्हें ही गद्दी पर बैठाना योग्य है । सभाकुमारी जी ने भी यह बात मान ली ।
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कहा भी है- ‘सभाबाई तीन वर्ष’(गुरु पद्धति) । चौथे वर्ष सब समाज ने परम विरक्त भजनानन्दी महान् महात्मा मसकीन जी को आचार्य गद्दी पर विराजमान किया और आनन्द के साथ मसकीनदासजी महाराज समाज का संचालन करने लगे । समाज में भी मत- भेदों के मिट जाने पर परमानन्द की लहर चल पडी । सब ओर अपने भजनानन्दी आचार्य का अनुकरण करके अपना समय भजन ध्यान में ही व्यतीत करने लगे । निष्पक्ष दादूवाणी के प्रवचनों का आनन्द लेने लगे ।
(क्रमशः)

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