🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२२. आपने भाव को अंग १३/१६
.
सुन्दर अपने भाव करि, पूजै देवी देव ।
यह मैं पायौ पुत्र धन, बहुत करी तीं सेव ॥१३॥
पुरुष अपने मन के भावों के कारण ही किसी देवी-देवता की पूजा-आराधना में लगता है तथा अकस्मात् उस का फल(पुत्रोत्पत्ति आदि) मिल जाने पर वह सोचने लगता है कि उस देवी-देवता की अतिशय आराधना के कारण ही मेरे यहाँ यह पुत्र उत्पन्न हुआ है ॥१३॥
.
सुन्दर सूकै हाड कौं, स्वान चचोरै आइ ।
अपनौई मुख फोरि कै, लोही चाटै खाइ ॥१४॥
जैसे कोई मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी चबाने के कारण उसकी रगड़ से उसके मसूड़ों से निकले हुए रक्त को चूस चूस कर वह समझने लगता है कि यह मधुर स्वाद उस सूखी हड्डी से ही निकल रहा है ॥१४॥
.
सुन्दर अपने भाव करि, आप कियौ आरोप ।
काहू सौं सन्तुष्ट ह्वै, काहू ऊपर कोप ॥१५॥
यह मनुष्य अपने मन में उद्भूत विचारों के कारण कभी स्वयं को ही उपालम्भ(आरोप) देने लगता है और कभी किसी से प्रसन्न होता है और कभी दूसरों पर क्रोध करने लगता है ॥१५॥
.
अपनौ ई सब भाव है, जो कछु दीसै और ।
सुन्दर समुझै आतमा, तब याही सब ठौर ॥१६॥
यहाँ वस्तुतथ्य(सचाई) यह है कि मनुष्य के ये अपने ही मानसिक विचार हैं जिस से वह अन्यथा(विपरीत) सोचने लगता है । यदि वह यह सब कुछ छोड़कर केवल अध्यात्मचिन्तन करने लगे तो उसकी ये सब भ्रान्तियाँ स्वतः ही मिट जायँ ॥१६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें