मंगलवार, 24 मार्च 2026

‘‘दादूपंथी दासानुदास’’

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज ने समाज की समस्त मर्यादाओं का तथा रीति नीतियों का निर्वाह भली भांति किया था । आप इष्ट में पूर्ण श्रद्धा के तो प्रतीक ही थे । पाठ, पूजा, ध्यान, धारणा, दैनिक कथा, प्रवचन, आरती, मंदिर का भोग, भजनशाल तथा समाधियों पर धूप दीप, पंक्ति में आकर संतों के साथ दोनों समय भोजन करना इत्यादि कार्यों का पूर्ण रुप से ध्यान रखते थे ।
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आप रामत में समुचित लवाजमे के सहित योग्य संतों के साथ भ्रमण करते थे । श्री भंडार व सदाव्रत आदि के सम्यक् संचालन में अच्छी रुचि रखते थे । पशुओं को घास दांणा बांटा आदि देने की बात सेवकों को स्मरण कराते रहते थे । पक्षियों के चुगा पानी की समुचित व्यवस्था रखाते थे ।
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अभ्यागतों के भोजन वस्त्र का पूरा -२ ध्यान रखते थे । स्थानीय सभी कार्य निपुणता, तत्परता और योग्यता से यथा रीति नीति से करवाते थे । उक्त कार्यों के कारण ही समाज की आप पर दॄढ श्रद्धा थी । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज इष्टदेव तथा समाज के सच्चे दास थे ।
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दादू सम्प्रदायाचायों के पीठ दादू द्वारा नारायणा दादूधाम की परंपरा की जो मुहर होती है उसमें भी यही अंकित रहता है - ‘‘श्रीरामजी दादू पंथी दासानुदास महन्त ------संवत ------’’ यह मुहर पंथाचार्यों के पीठ की गद्दी की मुहर से युक्त होते हैं । इस मुहर के नीचे आचार्य जी के हस्ताक्षर होते थे ।
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज उक्त मुहर के समान ही अपने को इष्टदेव व समाज का दास ही समझते थे । आचार्य प्रकाशदेव जी को मेलों में, उत्सवों में, बृहद् संत- सम्मेलनों में पंथ स्वरुप परमेश्‍वर को कई बार दंडवत करते हुये मैं(कनिरामजी) ने देखे थे । मेरे पूछने पर कि आप दंडवत किस को कर रहे थे । सामने वाणी जी भी नहीं थी ।
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तब वे कहते थे भेष भगवान् जो एकत्र हो रहा है उसे ही मैं दंडवत कर रहा था । उक्त मुहर में अंकित ‘‘दादूपंथी दासानुदास’’ भावना प्रकाशदेव जी महाराज में दॄढ थी । उक्त भावना से सूचित होता है कि उनकी नम्रता कितनी विशाल थी । उन में अभिमान का तो लेश भी नहीं ज्ञात होता था ।
(क्रमशः)

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