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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४३/५६
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अंजन कीया नैंन मैं, सबही राखै मोहि ।
सुन्दर हुन्नर बहुत हैं, कोइ न जांनै तोहि ॥५३॥
जैसे यह बाजीगर किसी दर्शक की आँखों में अभिमन्त्रित काजल लगा कर उसको विविध दृश्य दिखा देता है; उसी प्रकार आप प्रभु के पास भी ऐसे अनेक हुनर(कला) हैं कि उनका उपयोग करते हुए आप संसार को मुग्ध (अपनी ओर आकृष्ट) किये रहते हैं । आप की इस कला को कोई नहीं जान पाया ॥५३॥
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ब्रह्मादिक शिव मुनि जनां, थाके सब ही संत ।
सुन्दर कोउ न कहि सकै, जाकौ आदि न अंत ॥५४॥
साधारण मनुष्य की तो बात क्या कहें ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं बड़े बड़े प्रसिद्ध ऋषि मुनि भी, जो निरन्तर आप की ही साधना में लगे रहते हैं, वे भी आज तक आप के आदि या अन्त का पार नहीं पा सके ॥५४॥
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सुन्दर सब चक्रित भये, वचन कह्या नहिं जाइ ।
टग टग रहे सु देखते, ठगमूरी सी खाइ ॥५५॥
वे सभी आपका यह अनुपम लोकोत्तर क्रियाकलाप देख कर चकित हैं । इसके वर्णन के लिये उनके मुख से एक भी वचन निकलना सम्भव नहीं हो पा रहा है । वे भौंचक(किङ्कर्तव्य विमूढ) हो कर एक दृष्टि से आपको निरन्तर देख रहे हैं ॥५५॥
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बातैं कोउ न कहि सकै, थकित भये सिध साध ।
सुन्दर हू चुप करि रहे, वह तौ अगम अगाध ॥५६॥
जब वे समर्थ सिद्ध साधक ही आपका यथातथ वर्णन करने में असमर्थ पा कर, थके हुए से, मौन ग्रहण कर बैठे हैं तब मुझ गरीब सुन्दरदास की क्या सामर्थ्य है कि आप जैसे अगम्य एवं गम्भीर शक्तिशाली की प्रशंसा में कुछ कहने का अपने में सामर्थ्य जुटा पाऊँ ! ॥५६॥
(क्रमशः)

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