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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४५/४७
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सुन्दर बरिखा अति भई, सूकि गई सब साख ।
नींव फल्यौ बहु भांति करि, लागे दाड्यौं दाख ॥४५॥
अमृतमय गुरुज्ञानापेदश की अतिशय वृष्टि के प्रभाव से, साधक द्वारा साधनचतुष्टय करने से, उस के विषयभोगादिक की खेती सूख गयी । परन्तु वहाँ भी यह अतिशय आश्चर्यमय घटना हुई कि जहाँ कटु रस से परिपूर्ण नीम का वृक्ष फला फूला(हरा भरा) ही खड़ा रह गया तथा अब उस में अनार, अमरूद, अंगूर(दाख) आदि(अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षान्ति) फल दिखायी देने लगे ॥४५॥ (इस साषी का सवैया में व्याख्यान नहीं हुआ ।) ॥
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मिष्ट सु तौ करवौ लग्यौ, करवो लाग्यौ मीठ ।
सुन्दर उलटी बात यह, अपनै नैंनहि दीठ ॥४६॥
अब महात्मा श्रीसुन्दरदासजी अधोलिखित तीन साषियों से इस 'विपर्यय' पर अपना अनुभव सुनाते हैं -उस गुरुज्ञानोपदेश का हम पर भी यह प्रभाव हुआ कि पहले(गुरुपदेश सुनने से पूर्व) हमें जो सांसारिक भोग मधुर(अनुकूल) प्रतीत होते थे, वे ही अब(गुरु से ज्ञानोपदेश प्राप्ति के बाद) वे ही कटु(त्याज्य) लगने लगे, जिन त्याग, वैराग्य आदि से उपेक्षा या घृणा(कटुता) थी वे ही गुण अब मधुर(ग्राह्य) लगने लगे । हमारे जीवन में भी, उस ज्ञानोपदेश के प्रभाव के कारण, यह विपरीत घटना हुई । इतना ही नहीं; हमने स्वयं यह वैपरीत्य अपने गुरुजनों की पवित्र चर्चा में भी अपनी आंखों देखा है ॥४६॥
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मित्र सु तौ बैरी भये, बैरी हूये मिंत ।
सुन्दर उलटी बात सौं, भागी सबही चिंत ॥४७॥
इस ज्ञानोपदेश के हमारी बदली हुई जीवनचर्या के कारण पहले जो मोह, ममता, मित्र कलत्र आदि हमारे अनुकूल(प्रिय) थे वे आज हमारे बैरी(विरोधी) बन गये; तथा उस समय जो(साधु, सन्त, सच्छास्त्र आदि) वैरी प्रतीत होते थे वे ही अब हमारे मित्र(सुहृत्) बन गये । तथा सबसे बड़ी बात यह हुई कि उस गुरुपदेश के प्रभाव से हमारी सर्वविध सांसारिक चिन्ताएँ(वासना) पूर्णतः निवृत्त हो गयीं ॥४७॥
(क्रमशः)

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