सोमवार, 9 मार्च 2026

*उपदेश ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल**साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।*
*काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥टेक॥*
*मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।*
*बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥*
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*उपदेश ॥*
देखि जनम ज्यूँ हार्यौ रे ।
मेरी मेरी करि करि बौरे, राम बिसार्यौ रे ॥टेक॥
राचि माचि रह्यौ मैं बड मैं बड, कारिज न सार्यौ रे ।
पूत कलित धन जोबन माया मैं, गरबि गलार्यौ रे ॥
इंद्र्याँ कौं स्वारथ बहु कीनौं, पेट पसार्यौ रे ।
परधन परदारा परपँच तैं, मन नहिं मार्यौ रे ॥
गरब सरब सुख संपति माँहीं, हरि न निहार्यौ रे ।
मरती बार बिसूरण लागौ, धरणि उतार्यौ रे ॥
बालापणि तरणापैं बुढपणि, हरि न संभार्यौ रे ।
बषनां पहली बात बिगाड़ी, पछै पुकार्यौ रे ॥६५॥
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संसारासक्त जीव को उपदेश देते हुए कहते हैं, हे मूर्ख जीव ! उन बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर जिनके कारण तूने देवदुर्लभ मनुष्य जन्म व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया है । वस्तुतः हे बौरे = बावरे = मूर्ख मनुष्य ! तूने इस नश्वर संसार को जो न हमारा था, न है और न आगे होगा को अपना कह-कहकर, मान-मानकर उस परमात्मा को बिसार दिया है जो हमारा था, है और सदैव रहेगा ।
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मैं पैसेवाला हूँ, मैं धनवान हूँ, मैं जनवान हूँ, मैं समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ आदि नाना प्रकार के बडप्पन जन्य अहंकारों में राचि-माचि = आकंठ = पूर्णरूपेण डूबा हुआ है जिसके कारण उस कार्य को संपादित नहीं कर पाया जिसके लिये परमातमा ने अहैतुकी कृपा करके मनुष्य जन्म दिया है ।
“कबहुँक करि करुणा नर देही ।
देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥”
“एहि तन करि फल विषय न भाई ।
स्वर्गउं स्वल्प अंत दुखदाई ॥”
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिस्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ गीता १६/१४-१५॥
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वस्तुतः हे मूर्ख मनुष्य ! तू तो पुत्र, पत्नी, धन, यौवन, माया = ऐश्वर्यादि के मद में मस्त होकर गर्जता फिर रहा है । इन्द्रियों को तृप्त करने के लिये ही तूने नाना विस्तारवाले अनेक व्यापार = धन्धे, कार्य-व्यवहार कर रखे हैं । दूसरों के धन व स्त्रियों को हड़पने के लिये प्रपंच-पाखंड से तूने मन को विरत कभी किया ही नहीं है ।
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सर्वरूपेण सुख संपति के गर्व में ही गरक हुआ पड़ा है । हरि = परात्पर-परब्रह्म को जानना तो दूर जानने का प्रयत्न तक तूने नहीं किया है । जब मरने लगता है और घरवालों द्वारा चारपाई पर से धरती पर उतार लिया जाता है तब अपने पूर्वकृत कर्मों को स्मरण कर-करके दहाड़ दे-देकर रोने लगता है कि हाय ! जिनको मैं अपना मानता था, जिनको प्राप्त करने में मैंने इतना भारी परिश्रम किया है, वे सभी मेरे से छूट रहे हैं । हाय मैं क्या करूँ ? जिस शरीर को मैं अपना समझता था, वह भी मेरे साथ नहीं जाकर यहीं छूटे जा रहा है । हाय ! हाय !! मेरे प्रयत्न व्यर्थ हुए जा रहे हैं ।
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कितना मूर्ख रह गया मैं कि मैंने न बालकपन में, न युवावस्था में, न जवानी में और न ही वृद्धावस्था में परमात्मा का भजन-स्मरण किया है । बषनांजी कहते हैं अवसर रहते भजन-स्मरण न करके पहले ही मूर्ख मनुष्य ने अपनी बात को बिगाड़ ली जिसके कारण अंत समय में उसे पुकारना पड़ रहा है, पश्चाताप करना पड़ रहा है । “समय चुके पुनि का पछिताने ॥” ६५॥

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