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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. अथ आपने भाव को अंग १/४
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सुन्दर अपनौ भाव है, जे कछु दीसै आंन ।
बुद्धि योग बिभ्रम भयौ, दोऊ ज्ञान अज्ञांन ॥१॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी जिज्ञासु को समझाते हैं - जिस मनुष्य के हृदय में जैसा भाव(विचार) होता है वैसा ही उस को बाहर दिखायी देता है । उस के मन में उत्पन्न होने वाले ज्ञान एवं अज्ञान - दोनों ही उसकी बुद्धि के भ्रममात्र हैं ॥१॥
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जो यह देखै क्रूर ह्वै, तौ वह होत कृतांत ।
सुन्दर जौ यह साधु ह्वै, तौ आगै है सांत ॥२॥
यदि वह सामने वाले को क्रूर(अपने प्रति हिंसक) समझ बैठता है तो उस को सामने वाला यमराज के समान दिखायी देने लगता है । और यदि वह साधु स्वभाव समझता है तो सामने वाला पुरुष भी उसको सन्त(शान्त) ही दिखायी देता है ॥२॥
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सुन्दर जौ यह हंसि उठै, तौ आगै हंसि देत ।
जो यह काहू देत है, तौ वह आगै लेत ॥३॥
यदि यह सामने वाले को देख कर प्रसन्न होता(हंसता) है तो सामने वाला भी उस को प्रसन्न होता हुआ दिखायी देता है । और यदि वह उसे अपनी आकृति(चेहरे) के हाव भाव से कुछ देने का संकेत करता है तो वह सामने वाला भी उसे उसी रूप में लेने को तत्पर हो जाता है ॥३॥
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जो यह टेढौ होत है, आगै टेढौ होइ ।
सुन्दर परतख देषिये, दर्पन मांहे जोइ ॥४॥
यदि यह सामने वाले को अपनी आकृति से बांके(विपरीत) भाव दिखाता है तो वह भी उस भाव को उसी(विरोधी) भाव के रूप में ग्रहण करता है ।
इस का प्रत्यक्ष उदाहरण दर्पण(शीशा) है । दर्पण में आपकी आकृति वैसी ही दिखायी देगी जैसी कि वह वस्तुतः है ॥४॥
(क्रमशः)

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