*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १३/१६*
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*आज्ञा में ऊभा रहै, एक मना इकतार ।*
*रज्जब उज्वल अनन्य ह्वै, वह उतरेगा पार ॥१३॥*
जिसका हृदय उज्वल है और जो एक मन से सदा गुरु-गोविन्द की आज्ञा में ही खड़ा रहता है, वह अनन्य दशा को प्राप्त होकर संसार-सागर से अवश्य पार हो जायगा ।
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*आज्ञा में अघ ऊतरैं, आज्ञा पावन प्राण ।*
*सो आज्ञा आठों पहर, जन रज्जब उर आन ॥१४॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने से पाप नष्ट हो जाते हैं, प्राणी पवित्र हो जाता है, उस गुरु-गोविन्द की आज्ञा को अष्ट पहर हृदय में रखना चाहिये ।
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*आज्ञा में ऊंची दशा, आज्ञा उत्तम ठौर ।*
*उभय एक आज्ञा चल्यों, सो आज्ञा शिर मौर ॥१५॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने में उच्च अवस्था और उत्तम स्थान प्राप्त होता है, जीव-ब्रह्म दोनों एक हो जाते हैं । यह आज्ञा पालन रूप साधन सभी साधनों में शिरोमुकुट के समान है ।
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*शिष श्रद्धा यों चाहिये, ज्यों वसुधा रतिवन्त ।*
*रज्जब वर्षा गुरु वयन, लिया दशों दिश कन्त ॥१६॥*
१६-१७ में शिष्य को प्रेरणा कर रहै हैं - जैसे पृथ्वी की श्रद्धा इन्द्र में होती है तब वर्षा रूप से पृथ्वी अपने स्वामी इन्द्र को प्राप्त करती है । वैसे ही शिष्य की श्रद्धा गुरु वचनों में होनी चाहिये तभी दशों दिशा में परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
(क्रमशः)

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