🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।*
*माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥*
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*चांणक उपदेश ॥*
मन रे हरत परत दुवै हार्या ।
रामचरण जौ तैं हिरद्यौं बिसार्या ॥टेक॥
माया मोह्यौ रे क्यूँ चीति न आयौ ।
मनिख जमारौ तैं अहलौ गमायौ ॥
कण छाड्यौ निकणैं चित लायौ ।
थोथिरौ पिछौड़्यौ क्यूँ हाथि न आयौ ॥
साच तज्यौ झूठै मन मान्यूँ ।
बषनां भूलौ रे तैं भेद न जान्यूँ ॥८४॥
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हरत-परत = गिरते-पड़ते, दुनियावी कामों को करते करते “गृह कारिज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥” दुवै = दोनों-लोक तथा परलोक । अहलौ = व्यर्थ ही । निकणैं = अतत्व । थोथिरौ = पोला, खाकला । पिछौड्यौ = गाहा, कूटा, दाँय की ।
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हे मन ! तूने रामजी के चरण-कमलों को हृदय में से विस्मृत कर देने व सांसारिक काम-काजों को करते रहने के कारण, विषयों को भोगते रहने के कारण दुवै = लोक और परलोक दोनों को ही हार दिया है । तू माया में ही मोहित हुआ रहा । उसके अतिरिक्त कुछ और भी है, इसका तूने जरा भी चिंतन नहीं किया ।
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देवों को भी दुर्लभ मनुष्य शरीर तूने यौंही = व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया । तूने कण रूपी परमात्मा को छोड़कर निकण = खाकले रूपी माया में अपना मन लगाये रखा । वस्तुतः तू जीवन भी खाकले को ही कूटता रहा जिससे तेरे हाथ कण का लेश भी नहीं आया । तूने त्रिकालावाधित सतस्वरूप परमात्मतत्व को छोड़ दिया और झूठै = केवल मध्य में ही दीखने वाली माया को अंगीकृत कर लिया ।
“अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥गीता २/२८॥”
बषनां कहता है, हे मनुष्य तू भ्रम में पड़ गया । तूने सच-झूठ का, नित्य-अनित्य का, अपने-पराये का रहस्य नहीं जाना ॥८४॥

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